Father of the Nation : महात्मा गांधी की जीवनी: सत्य, अहिंसा और स्वतंत्रता संग्राम की अमर कहानी

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Father of the Nation : महात्मा गांधी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं है, बल्कि सत्य की खोज, आत्मसंघर्ष और मानवता के उत्कर्ष की एक अमर साधना है। 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी का पूरा जीवन प्रयोगों, आत्म-सुधार और नैतिक साहस की अनवरत प्रक्रिया रहा।

उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ उनके विचारों की गहराई को बखूबी दर्शाती है। दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने ‘सत्याग्रह’ का अमोघ अस्त्र गढ़ा, जिसने आगे चलकर पूरे भारतीय स्वाधीनता संग्राम की दिशा ही बदल दी।

संस्कारों की भूमि: पोरबंदर से लंदन तक का सफर

गांधीजी के व्यक्तित्व का निर्माण उनके पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी प्रशासनिक दायित्वों से जुड़े थे और माता पुतलीबाई धार्मिक आस्था, व्रत और संयम के लिए जानी जाती थीं। बालक मोहनदास ने घर के वातावरण से सत्य, आत्मसंयम और धार्मिक सहिष्णुता के संस्कार ग्रहण किए।

बाद में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। वहां पश्चिमी समाज और आधुनिक जीवन-पद्धति से उनका परिचय हुआ। साथ ही उन्होंने भगवद्गीता सहित विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया, जिसने उनके चिंतन को और अधिक व्यापक बना दिया।

दक्षिण अफ्रीका: सत्याग्रह का जन्म और पहला संघर्ष

वर्ष 1893 में गांधीजी एक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। वहां भारतीयों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव और अपमान ने उनके जीवन की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया।

इस व्यक्तिगत अपमान को उन्होंने एक सामाजिक अन्याय के रूप में देखा और वहीं से सत्य और अहिंसा के प्रयोग की शुरुआत हुई। यहीं उन्होंने ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा विकसित की, जिसमें सत्य के प्रति आग्रह, अन्याय का प्रतिरोध और आत्मबल शामिल था।

भारत वापसी और जन आंदोलनों का नेतृत्व

1915 में भारत लौटने के बाद गांधीजी ने तुरंत कोई बड़ा आंदोलन शुरू नहीं किया। उन्होंने पहले पूरे देश के गांवों, किसानों और मजदूरों से मिलकर उनकी वास्तविक स्थिति को समझा।

  • चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह: 1917 के चंपारण आंदोलन से उन्होंने नील की खेती करने वाले किसानों के हक की लड़ाई लड़ी। इसके बाद 1918 में खेड़ा और अहमदाबाद के मिल मजदूरों का संघर्ष हुआ।

  • असहयोग आंदोलन (1920): इसमें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का संदेश दिया गया। चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बना।

  • दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह (1930): साबरमती से दांडी तक की यात्रा ने एक साधारण नमक को प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया।

  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): ‘करो या मरो’ के आह्वान के साथ यह अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और निर्णायक चरण साबित हुआ।

गांधीजी और डॉ. आंबेडकर: सामाजिक न्याय के दो दृष्टिकोण

भारतीय इतिहास में गांधीजी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर का वैचारिक मतभेद एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय है। दोनों ही दलितों और वंचितों के उत्थान के पक्षधर थे, लेकिन दोनों की राहें अलग थीं। 1932 का पूना पैक्ट इसी मतभेद का परिणाम था। कम्यूनल अवॉर्ड में दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान था, जिसके विरोध में गांधीजी ने आमरण अनशन किया। अंततः दोनों नेताओं के बीच समझौता हुआ और पृथक निर्वाचक मंडल की जगह संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में आरक्षित सीटों का प्रावधान स्वीकार किया गया।

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