लोकसभा में शाह की ‘हुंकार’: कल नक्सलवाद का आखिरी दिन, 12 साल के ‘मोदी युग’ ने तोड़ा लाल आतंक का गुरूर!

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इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा 31 मार्च भारतीय संसद के इतिहास में सोमवार का दिन शौर्य, संकल्प और एक लंबे संघर्ष के सुखद अंत की गूंज का गवाह बना। अवसर था—नक्सल मुक्त भारत पर विशेष बहस। देश के गृह मंत्री अमित शाह ने सदन के पटल से वह घोषणा की, जिसका इंतजार भारत आधी सदी से कर रहा था। शाह ने दो टूक कहा, “कल (31 मार्च 2026) भारत में नक्सलवाद का आखिरी दिन है। हमने उस ‘लाल आतंक’ की परछाईं को मिटा दिया है जिसने दशकों तक आदिवासियों के विकास को बंधक बना रखा था।”

‘लाल आतंक’ के अंत का श्रेय: जवानों और आदिवासियों को गृह मंत्री ने भावुक होते हुए इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय सीमा सुरक्षा बलों (CAPF), कोबरा कमांडो, राज्य पुलिस, DRG के जवानों और उन स्थानीय आदिवासियों को दिया, जिन्होंने नक्सलियों के खौफ के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई। शाह ने कहा कि दंडकारण्य, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था, आज वहां उनकी मुख्य कमेटी ध्वस्त हो चुकी है। उन्होंने इस लड़ाई में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 5,000 सुरक्षाबलों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी शहादत ने ही आज बस्तर की फिजा बदली है।

कांग्रेस पर तीखा प्रहार: ‘इंपोर्टेड आदर्श और सत्ता का संरक्षण’ बहस के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस की पुरानी नीतियों को ‘नक्सलवाद की जननी’ करार दिया। उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कहा:

  • विदेशी विचारधारा: शाह ने तंज कसते हुए कहा कि नक्सली भगवान बिरसा मुंडा या भगत सिंह को नहीं, बल्कि ‘माओ’ को अपना आदर्श मानते हैं। उनके आदर्श भी ‘इंपोर्टेड’ हैं।

  • सत्ता का समर्थन: गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि 1970 के दशक में सत्ता के संरक्षण के बिना ‘रेड कॉरिडोर’ का बनना मुमकिन नहीं था। उन्होंने कहा कि जिस विचारधारा की नींव ही दूसरे देश की प्रेरणा से रखी गई, वह भारत का भला कभी नहीं सोच सकती।

  • विकास में बाधा: शाह ने सवाल उठाया कि नक्सलियों ने स्कूल, बैंक और अस्पताल क्यों जलाए? उत्तर स्पष्ट था—वे नहीं चाहते थे कि आदिवासी पढ़-लिखकर मुख्यधारा में शामिल हों।

‘गोली का जवाब गोली से’: नीति बिल्कुल साफ सदन में विपक्षी वकीलों और मानवाधिकार की दुहाई देने वालों को जवाब देते हुए अमित शाह ने सरकार की नीति को ‘क्रिस्टल क्लियर’ (शीशे की तरह साफ) बताया। उन्होंने कहा:

  1. संवाद और सुरक्षा: जो हथियार डालेगा, सरकार उसकी पूरी मदद करेगी। संविधान में अन्याय के खिलाफ लड़ने का रास्ता बताया गया है।

  2. सख्त चेतावनी: जो हथियार उठाएगा और गोली चलाएगा, उसे गोली से ही जवाब दिया जाएगा। यह सरकार बंदूक की नली से डरने वाली नहीं है।

  3. मानवाधिकार का दोहरा चरित्र: शाह ने पूछा कि केवल नक्सलियों के मानवाधिकार की बात क्यों होती है? उन हजारों निर्दोष आदिवासियों और जवानों के मानवाधिकार का क्या, जो इस हिंसा की बलि चढ़ गए?

नक्सलवाद और गरीबी का मिथक गृह मंत्री ने आंकड़ों के जरिए इस तर्क को खारिज किया कि नक्सलवाद गरीबी या साक्षरता की कमी के कारण पनपा। उन्होंने बक्सर, सहरसा और बलिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी साक्षरता दर और आय बस्तर के समान ही थी, लेकिन वहां नक्सलवाद नहीं पनपा। यह साबित करता है कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की कमी नहीं, बल्कि एक उग्र वामपंथी विचारधारा थी जिसे जबरन थोपा गया।

2026 का नया सवेरा अमित शाह के संबोधन का सार यही था कि 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘संवाद, सुरक्षा और समन्वय’ की जो त्रिवेणी चली, उसने 12 साल में वो कर दिखाया जो पिछले 50 साल में नामुमकिन था। आज बस्तर से ‘लाल आतंक’ की परछाईं हट चुकी है और विकास की रोशनी वहां पहुँच रही है।

कल, यानी 31 मार्च 2026 को जब सूरज उगेगा, तो वह एक ऐसे ‘नक्सल मुक्त भारत’ का उदय होगा, जहाँ सत्ता बंदूक की नली से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और संविधान की शक्ति से चलेगी।

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