Lal Bahadur Shastri : भारत 2 अक्टूबर 2026 को देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती बड़े ही आदर और गर्व के साथ मना रहा है। अपनी सादगी, अभूतपूर्व ईमानदारी और दृढ़ संकल्प के लिए जाने जाने वाले शास्त्री जी का व्यक्तित्व हर देशवासी के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। बेहद कम उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण काफी साधारण परिस्थितियों में हुआ।
काशी विद्यापीठ से मिला ‘शास्त्री’ का नाम और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
किशोरावस्था में ही लाल बहादुर शास्त्री भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की तरफ आकर्षित हो गए थे। महज 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
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शास्त्री की उपाधि: उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई काशी विद्यापीठ से पूरी की, जहां उन्हें ‘शास्त्री’ की मानद उपाधि से नवाजा गया। इसके बाद उन्होंने अपने पारिवारिक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ को हटाकर ‘शास्त्री’ शब्द को हमेशा के लिए अपने नाम के साथ जोड़ लिया।
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नैतिकता की मिसाल: आजादी के बाद वे उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों के पद पर रहे। 1956 में जब वे रेल मंत्री थे, तब एक भीषण रेल दुर्घटना हुई। इस त्रासदी की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है।
जय जवान, जय किसान: जब 1965 के युद्ध में दिखाया अदम्य साहस
पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में बागडोर संभाली। हालांकि उनका कार्यकाल काफी संक्षिप्त रहा, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह बेहद महत्वपूर्ण था।
वर्ष 1965 में जब भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा और देश में खाद्यान्न का संकट आया, तब उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का ऐतिहासिक नारा दिया। यह नारा देश की सीमा पर डटे सैनिकों और खेतों में पसीना बहाते किसानों के प्रति उनका सर्वोच्च सम्मान था।
उन्होंने देश में खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता के लिए हरित क्रांति (Green Revolution) और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए श्वेत क्रांति (White Revolution) की मजबूत नींव रखी।
ताशकंद समझौता और देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध 10 जनवरी 1966 को ताशकंद (तत्कालीन सोवियत संघ) में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुए ऐतिहासिक ‘ताशकंद घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ।
लेकिन बेहद दुखद बात यह रही कि इस समझौते के अगले ही दिन, 11 जनवरी 1966 को 61 वर्ष की आयु में ताशकंद में शास्त्री जी का आकस्मिक निधन हो गया। राष्ट्र के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें उसी वर्ष मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
विजय घाट पर दी जाती है श्रद्धांजलि
उनकी जयंती के अवसर पर हर साल परंपरा के अनुसार देश के दिग्गज नेता दिल्ली स्थित उनके समाधि स्थल ‘विजय घाट’ पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। इसके अलावा, देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में प्रार्थना सभाएं, क्विज प्रतियोगिताएं और भाषण आयोजित किए जाते हैं, जहां युवा पीढ़ी को शास्त्री जी की सादगी और विचारों से रूबरू कराया जाता है।


