Jalaun बुजुर्ग शिक्षा पहल: जब दादा-दादी की उम्र में बुजुर्गों ने टांगा स्कूल बैग

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Jalaun बुजुर्ग शिक्षा पहल: कहते हैं कि सीखने और पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। इस बात को सच कर दिखाया है उत्तर प्रदेश के Jalaun के कुछ बुजुर्गों ने। जालौन में शिक्षा को लेकर एक प्रेरणादायी और अनोखी पहल देखने को मिली है। ज्वांइट मजिस्ट्रेट रिंकू सिंह राही की प्रेरणा से अब बुजुर्ग भी शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं। जालौन तहसील क्षेत्र के ग्राम छानी स्थित प्राथमिक विद्यालय में ग्रामीणों ने पांच बुजुर्गों का विधिवत स्कूल में प्रवेश कराकर एक नई मिसाल पेश की है। इस पहल की पूरे इलाके में सराहना हो रही है।

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ड्रेस पहनकर स्कूल पहुंचे बुजुर्ग, माला पहनाकर स्वागत हुआ

मंगलवार का दिन इस स्कूल के लिए बेहद खास था। जब ये बुजुर्ग विद्यार्थी स्कूल ड्रेस पहनकर और कंधों पर बैग टांगे प्राथमिक विद्यालय पहुंचे, तो वहां का माहौल देखने लायक था। स्कूल के बच्चों, शिक्षकों और ग्रामीणों ने फूल-मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया। एसडीएम की पहल पर शेखपुर बुजुर्ग निवासी 72 वर्षीय विद्यासागर गोस्वामी और 50 वर्षीय गुड्डी देवी ने स्कूल में प्रवेश लिया। बुधवार को दोनों बच्चों के साथ स्कूल भी पहुंचे और पढ़ाई शुरू की। वहीं छानी खास गांव के देवी दीन, मिश्रीलाल, वंश गोपाल, भुलई और किरण ने भी विद्यालय में दाखिला लेकर नई शुरुआत की। सभी की उम्र 60 वर्ष से अधिक है।

बुजुर्गों के चेहरों पर स्कूल आने की जो खुशी थी, उसने हर किसी का दिल जीत लिया। उन्हें बच्चों के साथ ही क्लास में बैठाया गया, जहां शिक्षकों ने उन्हें बेहद प्यार से अक्षरों और शब्दों की पहचान कराई। पहली बार ब्लैकबोर्ड की तरफ देखते इन बुजुर्गों का उत्साह युवाओं जैसा था।

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ज्वांइट मजिस्ट्रेट रिंकू सिंह राही की प्रेरणा लाई रंग

ग्रामीणों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे ज्वांइट मजिस्ट्रेट रिंकू सिंह राही की बड़ी भूमिका है। वे लगातार इलाके में शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सुधारों को लेकर लोगों को प्रेरित करते रहते हैं।

उन्हीं की बातों से प्रभावित होकर गांव के लोगों ने तय किया कि जिन बुजुर्गों को बचपन में किसी वजह से पढ़ने का मौका नहीं मिला, उन्हें अब साक्षर बनाया जाए। इसी सोच के साथ गांव के इन पांच बुजुर्गों का स्कूल में बाकायदा एडमिशन कराया गया।

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शिक्षकों ने भी थपथपाई पीठ

स्कूल के शिक्षकों ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि बुजुर्गों में सीखने की ललक कमाल की है। कोई अपनी कॉपी पर नाम लिखने की कोशिश कर रहा था, तो कोई वर्णमाला सीख रहा था। क्लास में बैठे छोटे बच्चों ने भी तालियां बजाकर अपने इन नए सहपाठियों का हौसला बढ़ाया।

Jalaun से आई यह खबर बताती है कि अगर समाज में सही प्रेरणा मिले, तो बदलाव किसी भी उम्र में आ सकता है। इन बुजुर्गों का स्कूल जाना यह साबित करता है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर ढंग से जीने के लिए जरूरी है। उम्मीद है कि इस पहल से दूसरे गांवों के लोग भी प्रेरित होंगे।

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