Bengal elections: बाबरी मस्जिद vs राम मंदिर, धर्म आधारित राजनीति का उभरता प्रभाव

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Bengal elections: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। चुनाव में अभी करीब तीन महीने का वक्त है, लेकिन सियासी तापमान चरम पर पहुंचता दिख रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि आस्था और पहचान की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। एक तरफ बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिम ध्रुवीकरण की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ श्रीराम और राम मंदिर के जरिए हिंदू वोटों को एकजुट करने की कवायद। बंगाल की चुनावी पिच पर धर्म की राजनीति कितनी भारी पड़ेगी, यही सबसे बड़ा सवाल है।

बाबरी मस्जिद और राम मंदिर: धर्म के नाम पर सियासी रणनीति  

6 दिसंबर, बाबरी विध्वंस की बरसी के दिन बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘नई बाबरी मस्जिद’ की नींव रखी गई। उसी दिन, उसी जिले में राम मंदिर की नींव पड़ने का दावा भी सामने आया। इसके साथ ही साफ हो गया कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में सियासत की नींव धर्म के नाम पर रखी जा रही है।

हुमायूं कबीर की मुस्लिम राजनीति में एंट्री 

नई बाबरी मस्जिद के नाम पर हुमायूं कबीर ने खुद को मुस्लिम राजनीति के नए चेहरे के तौर पर पेश किया है। शिलान्यास के बाद पहली जुम्मा नमाज में भारी भीड़ जुटी। मस्जिद निर्माण के लिए चंदे का सैलाब आया और करोड़ों रुपये जुटने के दावे किए गए। फरवरी में एक लाख लोगों से कुरान पाठ कराने और उसके बाद निर्माण शुरू करने की घोषणा ने सियासी संदेश साफ कर दिया है। चुनावी बंगाल के धर्म युद्ध में नई बाबरी के वारिस बनकर घूम रहे हुमायूं कबीर ने ऐलान कर दिया है कि फरवरी में वो 1 लाख लोगों से कुरान का पाठ करवाएंगे।

दूसरी ओर, बीजेपी ने राम मंदिर और श्रीराम के नाम पर माहौल बनाना शुरू कर दिया है। कोलकाता में अयोध्या-शैली के राम मंदिर कॉम्प्लेक्स के पोस्टर लगे हैं। रामनवमी पर शिलान्यास की घोषणा, नंदीग्राम और अन्य इलाकों में मंदिर निर्माण की बात—ये सब हिंदू ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

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बंगाल चुनाव में धर्म और राजनीतिक गणित 

राजनीतिक गणित भी अहम है। बंगाल में मुस्लिम वोटर करीब 27 से 33 फीसदी हैं, जो लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत आधार रहे हैं। 2021 में इसी वोट बैंक के सहारे ममता बनर्जी सत्ता में लौटीं। हालांकि, बीजेपी का मानना है कि राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे पर वह इस बार कड़ी टक्कर दे सकती है। एक तरफ नई बाबरी मस्जिद तो दूसरी तरफ बंगाल में नए राम मंदिर का पोस्टर इशारा यह है कि इस बार बंगाल का चुनाव धर्म युद्ध की तरह ही लड़ा जाएगा। जिसमें बाबर की एंट्री करवाकर हुमायूं कबीर ने बंगाल में नए राजनीतिक समीकरण पैदा कर दिए हैं।

बंगाल में बाबरी से TMC में ‘खेला होबे’ ? 

  • 2011 से बंगाल के मुस्लिम वोटर हर चुनाव में लगातार TMC के साथ रहे
  • 27-33% मुस्लिम वोटर, TMC की राजनीतिक रीढ़ हैं
  • 2021 विधानसभा चुनाव में 80% मुस्लिम वोटों के सहारे TMC ने 213 सीटें जीती
  • 2024 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल इलाकों में स्ट्राइक रेट 90% से अधिक रहा

सवाल यही है—क्या बाबरी और राम मंदिर की राजनीति ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति को चुनौती दे पाएगी, या फिर बंगाल में एक बार फिर ममता का किला बरकरार रहेगा? इतना तय है कि इस बार का चुनाव विकास से ज्यादा धर्म की जमीन पर लड़ा जाएगा। 

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