AMU के वैज्ञानिकों का कमाल: नैनो-सिलिका तकनीक के लिए मिला भारतीय पेटेंट

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के जाकिर हुसैन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी ने अनुसंधान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकों को एक खास तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट मिला है, जिसे "ए नॉवेल नैनो सिलिका डिस्पर्स्ड सॉल्यूशन एंड ए प्रोसेस फॉर द प्रिपरेशन देअर ऑफ" नाम दिया गया है। इस तकनीक के आने से निर्माण कार्यों में सीमेंट की गुणवत्ता और मजबूती को एक नए स्तर पर ले जाया जा सकेगा।

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नैनो-सिलिका तकनीक (Nano-Silica Technology)

यह तकनीक डॉ. साद शमीम अंसारी, डॉ. सैयद मोहम्मद इब्राहिम और प्रो. सैयद दानिश हसन ने मिलकर तैयार की है। नैनो-सिलिका, जिसे ‘व्हाइट कार्बन ब्लैक’ भी कहा जाता है, वास्तव में सिलिकॉन डाइऑक्साइड  (एसआईओ-टू) के बेहद सूक्ष्म कणों (1-100 एनएम) का उपयोग करती है। परमाणु स्तर पर काम करने वाली यह नैनो-इंजीनियरिंग तकनीक सीमेंट के मिश्रण को अधिक स्थिर और बेहतर बनाने का एक किफायती तरीका प्रदान करती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे अब बाजार में उतारने की तैयारी भी की जा रही है।

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सामग्री में सुधार और मजबूती (Material Improvement and Strength)

डॉ. साद शमीम अंसारी के अनुसार, नैनो-सिलिका अपनी उच्च सक्रियता के कारण निर्माण सामग्री की मजबूती और रासायनिक प्रतिरोध को काफी बढ़ा देती है। जब इसे सीमेंट में मिलाया जाता है, तो यह हाइड्रेशन की प्रक्रिया को तेज कर देता है। इससे कंक्रीट पहले के मुकाबले अधिक घना, मजबूत और अभेद्य बन जाता है, जिससे इमारतों की उम्र लंबी होती है।

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बहुमुखी उपयोग और उत्पादन (Versatile Use and Production)

नैनो-सिलिका का इस्तेमाल केवल कंक्रीट तक सीमित नहीं है। यह प्लास्टिक, पेंट और रबर की कठोरता और घिसाव प्रतिरोध को भी बेहतर बनाता है। इसके अलावा, तेल के कुओं की सीमेंटिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स पैकेजिंग में भी इसके बेहतरीन परिणाम देखे गए हैं। इसे बनाने के लिए सोल-जेल जैसी वैज्ञानिक विधियों के साथ-साथ चावल के छिलके जैसे कृषि उत्पादों का भी उपयोग किया जा सकता है।

एएमयू के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह स्वदेशी तकनीक निर्माण क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। कम लागत और उच्च प्रदर्शन के कारण यह न केवल बड़े प्रोजेक्ट्स बल्कि आम घरों के निर्माण में भी टिकाऊपन सुनिश्चित करेगी।

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