लोकसभा में विपक्ष के जोरदार हंगामे और नारेबाजी के बीच मंगलवार को ‘केरल (नाम परिवर्तन) बिल, 2026′ (Kerala) को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश के दक्षिण भारतीय राज्य ‘केरल‘ का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से ‘केरलम‘ करना है।
लोकसभा में बिल पास के दौरान हुआ भारी हंगामा
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसद नीट प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग करने लगे। विपक्ष की नारेबाजी और विरोध के बीच ही केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह विधेयक पटल पर रखा। पीठ की अध्यक्षता कर रहे कृष्णा प्रसाद टेनेटी ने सांसदों से शांति बनाए रखने की अपील की, लेकिन व्यवधान जारी रहा।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और नित्यानंद राय ने विपक्ष की इस बात के लिए आलोचना की कि वे इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा में भाग नहीं ले रहे हैं। रिजिजू ने दुख जताते हुए कहा कि केसी वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता भी इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं रख रहे हैं। आखिरकार, बिना किसी लंबी चर्चा के विधेयक को ध्वनि मत से पास कर दिया गया।
‘केरलम’ नाम के पीछे की ऐतिहासिक वजह
मलयालम भाषा में इस राज्य को हमेशा से ‘केरलम’ ही कहा जाता रहा है। 1 नवंबर 1956 को जब भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ था, तब से ही वहां के लोग अपनी मातृभाषा के अनुसार राज्य का नाम ‘केरलम’ दर्ज करने की मांग कर रहे थे। 1 नवंबर को ‘केरल पिरवी दिवस’ भी मनाया जाता है। देश की आजादी की लड़ाई के समय से ही मलयालम भाषा बोलने वाले लोगों के लिए ‘संयुक्त केरल’ के गठन की जोरदार मांग रही है।
इसी कड़ी में 24 जून 2024 को केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार से अपील की थी कि संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत आवश्यक कदम उठाए जाएं। इसके बाद इस साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने भी राज्य का नाम बदलने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी थी। संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन के बाद अब यह राज्य आधिकारिक तौर पर ‘केरलम’ के नाम से जाना जाएगा।
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