Economic Milestone: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, निरंतर जारी भू-राजनीतिक तनावों और कठिन व्यापारिक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी दमदार और जुझारू क्षमता का परिचय दिया है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (Real GDP) वृद्धि दर 7.7% दर्ज की गई है। इसके साथ ही, नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP) में भी 8.9% की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की गई, जो भारतीय बाजार की मजबूती और स्थिरता को दर्शाती है। इन आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी अग्रणी स्थिति को सफलतापूर्वक मजबूत बनाए हुए है।
विनिर्माण और कृषि क्षेत्र की साझा मजबूती का परिणाम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आर्थिक वृद्धि कोई संयोग मात्र नहीं है, बल्कि यह विनिर्माण (Manufacturing), सेवा और कृषि सेक्टर की साझा मजबूती और सरकार की दूरगामी नीतियों का परिणाम है। सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने इस बार जीडीपी को सबसे ज्यादा मजबूती प्रदान की है। उत्पादन गतिविधियों में तेजी, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर बढ़ते सरकारी खर्च और घरेलू मांग में आए निरंतर सुधार ने अर्थव्यवस्था को एक नई गति दी है, जिससे भारत का आर्थिक ढांचा और अधिक लचीला बनकर उभरा है।
Economic Milestone: मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दोहरे अंकों की वृद्धि
इस वित्तीय वर्ष के आंकड़ों में सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन विनिर्माण क्षेत्र का रहा है, जहाँ दोहरे अंकों (Double-Digit) में वृद्धि दर्ज की गई है। विनिर्माण क्षेत्र की इस असाधारण तेजी की बदौलत पूरे सेकेंडरी सेक्टर ने 8.8% की मजबूत वृद्धि हासिल की है। निर्यात में आए उछाल और उत्पादन क्षमता में विस्तार ने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई पीएलआई (PLI) योजनाओं और बढ़ते प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) ने विनिर्माण इकाइयों को नई जान दी है, जिसका सकारात्मक असर अब आंकड़ों में साफ तौर पर झलक रहा है।
पीएलआई योजनाओं और बढ़ते पूंजी निवेश का दिखा असर
भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की इस सफलता के पीछे सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं, विशेषकर ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) का बड़ा हाथ रहा है। बढ़ते निवेश और घरेलू बाजार की क्रय शक्ति ने मैन्युफैक्चरिंग को जो गति दी, उसका सीधा लाभ देश में बड़े पैमाने पर हुए रोजगार सृजन और पूंजी निवेश (Capital Investment) दोनों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। नई फैक्ट्रियों की स्थापना और पुराने प्लांटों के विस्तार ने न केवल औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाया है, बल्कि युवाओं के लिए तकनीकी और गैर-तकनीकी क्षेत्रों में लाखों नए अवसर भी पैदा किए हैं।
घरेलू जरूरतों के साथ दुनिया की पसंद बना ‘मेड इन इंडिया’
आज भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहाँ वह न केवल अपनी विशाल घरेलू जरूरतों को सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रहा है। ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत दुनिया की बड़ी कंपनियां अब भारत को एक भरोसेमंद विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं। निर्यात आधारित उत्पादन में आई तेजी यह सिद्ध करती है कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद अब वैश्विक मानकों पर खरे उतर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में भारत की वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी और अधिक बढ़ने की प्रबल संभावना है।
