CBSE Result Row: ऑन-स्क्रीन मार्किंग विवाद पर शिक्षा सचिव का बड़ा बयान, 12वीं की आंसरशीट देखने की फीस घटी

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CBSE Result Row:CBSE कक्षा 12वीं के नतीजे आने के बाद से ही देश भर के छात्रों और अभिभावकों के बीच काफी चर्चा और थोड़ी नाराजगी देखने को मिल रही है। कई होनहार छात्रों का आरोप है कि इस साल बोर्ड ने जो नया डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम अपनाया है, उसकी वजह से उनके नंबर उम्मीद से काफी कम आए हैं। इस बढ़ते विवाद और सोशल मीडिया पर छात्रों के गुस्से को देखते हुए आखिरकार सरकार को सामने आना पड़ा है। स्कूल शिक्षा सचिव संजय कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके छात्रों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की है और कुछ बहुत बड़े एलान किए हैं। आइए जानते हैं कि इस पूरे विवाद की असल वजह क्या है और बोर्ड ने छात्रों को क्या राहत दी है। 

क्या है यह पूरा विवाद और छात्रों के आरोप

CBSE बोर्ड की कक्षा 12वीं के परिणाम घोषित होने के बाद से ही इंटरनेट और सोशल मीडिया पर एक अलग ही बहस छिड़ गई है। इसे सोशल मीडिया पर CBSE Result row के नाम से भी देखा जा रहा है। दरअसल, बहुत से छात्र-छात्राओं का कहना है कि उन्होंने साल भर कड़ी मेहनत की थी और परीक्षा में उनके पेपर भी बहुत अच्छे गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि उनके 90 से 95 प्रतिशत तक मार्क्स आएंगे, लेकिन जब रिजल्ट आया तो नंबर काफी कम थे।

इस साल पास होने वाले छात्रों का कुल प्रतिशत भी पिछले साल के मुकाबले करीब 3 फीसदी गिरकर 88% से 85% पर आ गया है। छात्रों का सीधा आरोप है कि बोर्ड ने इस बार कॉपियों की जांच के लिए जो नया डिजिटल सिस्टम यानी ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) इस्तेमाल किया है, उसी की तकनीकी गड़बड़ी के कारण उनके नंबर कटे हैं। अपनी मार्कशीट शेयर करते हुए छात्रों ने बोर्ड के इस नए तरीके पर बड़े सवाल उठाए हैं।

ऑन-स्क्रीन मार्किंग कोई नया प्रयोग नहीं है

बढ़ते आक्रोश के बीच स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता सचिव संजय कुमार ने साफ किया कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) कोई ऐसा कॉन्सेप्ट नहीं है जिसे बोर्ड ने अचानक या पहली बार आजमाया हो। उन्होंने जानकारी दी कि सीबीएसई ने सबसे पहले साल 2014 में ही इस डिजिटल सिस्टम की शुरुआत कर दी थी। हालांकि, उस समय देश में तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर और कंप्यूटर प्रणालियां उतनी मजबूत नहीं थीं, जिसकी वजह से इस प्रक्रिया को लगातार जारी रखना मुश्किल हो गया था। अब तकनीकी रूप से सक्षम होने के बाद इस साल इसे पूरी तरह से और सफलतापूर्वक फिर से लागू किया गया है। शिक्षा सचिव के अनुसार, इस डिजिटल सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो नंबरों को जोड़ने (टोटलिंग) में मानवीय गलतियां हो जाती थीं, वे अब पूरी तरह खत्म हो गई हैं।

13,000 उत्तर पुस्तिकाओं की ऑफलाइन जांच क्यों करनी पड़ी

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शिक्षा सचिव ने एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस बार 12वीं कक्षा की परीक्षाओं के बाद लगभग 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करके उनकी पीडीएफ (PDF) कॉपियां बनाई गई थीं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा के तीन कड़े स्तर बनाए गए थे और कॉपियां जांचने वाले शिक्षकों को विशेष ट्रेनिंग भी दी गई थी।

लेकिन, स्कैनिंग के दौरान मूल्यांकन टीम ने पाया कि करीब 13,000 उत्तर पुस्तिकाएं ऐसी थीं जिन्हें बार-बार स्कैन करने के बाद भी स्क्रीन पर साफ-साफ पढ़ा नहीं जा जा रहा था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि छात्रों ने परीक्षा लिखते समय बहुत हल्के रंग की स्याही (लाइट इंक) का इस्तेमाल किया था। छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए बोर्ड ने तुरंत फैसला लिया और उन सभी 13,000 उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल सिस्टम से अलग कर दिया। इसके बाद शिक्षकों ने उन कॉपियों की मैन्युअल यानी ऑफलाइन तरीके से जांच की और फिर उनके नंबर सिस्टम में दर्ज किए गए। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा और शुद्धता का पूरा ध्यान रखा गया है।

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री-चेकिंग और कॉपी देखने की फीस में ऐतिहासिक कटौती

जो छात्र अपने नंबरों से संतुष्ट नहीं हैं, उनके लिए शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई ने एक बहुत बड़ी राहत का एलान किया है। पहले अपनी आंसर शीट की एक कॉपी बोर्ड से मंगवाने के लिए छात्रों को 700 रुपये जैसी भारी-भरकम फीस देनी पड़ती थी, जिसे अब घटाकर सिर्फ 100 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा, मार्क्स के वैलिडेशन (सत्यापन) की फीस को भी 500 रुपये से घटाकर केवल 100 रुपये कर दिया गया है।

अगर कोई छात्र किसी खास सवाल के उत्तर की दोबारा जांच (री-चेकिंग) करवाना चाहता है, तो उसके लिए महज 25 रुपये की फीस तय की गई है। उदाहरण के तौर पर, अगर आप अपनी कॉपी भी देखना चाहते हैं और किसी एक सवाल को दोबारा चेक करवाना चाहते हैं, तो आपको कुल 225 रुपये खर्च करने होंगे।

नंबर बढ़ने पर पूरी फीस होगी वापस

सरकार ने छात्रों के हित में एक और बड़ा और संवेदनशील फैसला लिया है। शिक्षा सचिव संजय कुमार ने कहा कि हमारे लिए बच्चों की मानसिक स्थिति, उनका कल्याण और उनकी भलाई सबसे ऊपर है, पैसा हमारी प्राथमिकता बिल्कुल नहीं है। बोर्ड ने तय किया है कि अगर पुनर्मूल्यांकन या री-चेकिंग की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी छात्र के नंबरों में सुधार होता है या उसके अंक बढ़ते हैं, तो छात्र द्वारा आवेदन के लिए भुगतान की गई पूरी की पूरी राशि (100% रिफंड) उसके खाते में वापस कर दी जाएगी। बोर्ड का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी बच्चे को अपनी योग्यता से एक भी नंबर कम न मिले।

CBSE के नतीजों को लेकर उपजा यह विवाद अब शांत होता नजर आ रहा है। शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड ने कॉपियों की री-चेकिंग फीस को बेहद कम करके और गड़बड़ी होने पर पैसे वापस करने का नियम बनाकर छात्रों के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाई है। डिजिटल सिस्टम की अपनी खूबियां हैं, लेकिन हल्के रंग की स्याही वाली 13,000 कॉपियों को अलग निकालकर मैन्युअल जांचना यह साबित करता है कि बोर्ड तकनीकी गड़बड़ियों को लेकर सजग था। अब जो छात्र अपने रिजल्ट से खुश नहीं हैं, वे बेहद कम खर्च में अपनी उत्तर पुस्तिका देखकर अपनी संतुष्टि कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर न्याय पा सकते हैं।

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