Supreme Court में जजों की संख्या 33 बढ़कर हुई 38, लंबित मामलों को निपटाने के लिए राष्ट्रपति ने दी मंजूरी

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Supreme Court News: भारत की न्याय व्यवस्था और देश की सबसे बड़ी अदालत को लेकर एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अगर आप अखबारों या खबरों पर नजर रखते हैं, तो आपको पता होगा कि हमारी अदालतों पर मुकदमों का कितना भारी बोझ है। इसी बोझ को कम करने और लोगों को जल्दी इंसाफ दिलाने के लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रपति ने मिलकर एक बड़ा कदम उठाया है। अब देश की शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ा दिया गया है। आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और इससे आम जनता को क्या फायदा होगा।

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जजों की संख्या बढ़ाने के फैसले को मिली मंजूरी

रविवार को देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने केंद्रीय कैबिनेट के उस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी, जिसके तहत Supreme Court में जजों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाने का फैसला लिया गया है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर यह जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस नए अध्यादेश के माध्यम से Supreme Court अधिनियम, 1956 में जरूरी संशोधन किया गया है। इस बदलाव के बाद अब अदालत में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़कर 38 हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर अब शीर्ष अदालत में कुल 38 जज होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने इस महीने की शुरुआत में ही इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी थी।

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आखिर क्यों पड़ी जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत?

अब सवाल यह उठता है कि अचानक जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी? सरकार की तरफ से जारी बयान में यह साफ किया गया है कि इस फैसले का मुख्य उद्देश्य न्याय प्रक्रिया में तेजी लाना है। आज के समय में Supreme Court में लंबित यानी पेंडिंग मामलों की संख्या बढ़कर 92,000 से भी ज्यादा हो गई है। जजों की कमी की वजह से मुकदमों की सुनवाई में वक्त लगता है, जिससे आम जनता को न्याय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए जजों की संख्या में यह विस्तार किया गया है। सरकार इस फैसले को पूरी तरह कानूनी रूप देने के लिए संसद के आगामी सत्र में संशोधन विधेयक भी पेश करने जा रही है।

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संविधान और जजों की संख्या का पुराना इतिहास

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत हमारी संसद को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह कानून बनाकर Supreme Court के न्यायाधीशों की संख्या तय कर सकती है। अगर इतिहास पर नजर डालें तो साल 1956 में जब मूल अधिनियम बना था, तब मुख्य न्यायाधीश के अलावा सिर्फ 10 जज हुआ करते थे। लेकिन जैसे-जैसे देश की आबादी और मुकदमे बढ़े, संसद ने समय-समय पर जजों की संख्या में बढ़ोतरी की। इसके बाद साल 1960 में जजों की संख्या बढ़ाकर 13 की गई, फिर 1977 में 17 और 1986 में इसे 25 कर दिया गया। 21वीं सदी में काम का दबाव और बढ़ा तो 2008 में संख्या 30 हुई और साल 2019 में आखिरी बार इसे बदलकर मुख्य न्यायाधीश सहित 34 किया गया था। अब साल 2026 में यह संख्या बढ़कर 38 पहुंच चुकी है।

देश की न्याय प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में यह एक बेहद व्यावहारिक और जरूरी कदम है। Supreme Court में जजों की संख्या बढ़ने से मुकदमों की सुनवाई तेजी से हो सकेगी और सालों से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को राहत मिलेगी। लोकतंत्र में न्यायपालिका का मजबूत होना बेहद जरूरी है, और उम्मीद है कि इस फैसले से आम जनता का अदालत पर भरोसा और मजबूत होगा।

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