Badrinath Dham: उत्तराखंड की पहाड़ियों में आज सुबह एक अलग ही गूंज सुनाई दी। शंखध्वनि और 'जय बद्रीविशाल' के जयकारों के बीच, चारधाम यात्रा के पांचवें दिन आज चमोली जिले में स्थित भगवान बद्रीनाथ धाम के कपाट विधिवत रूप से खोल दिए गए हैं। सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर जैसे ही मंदिर के द्वार खुले, पूरा परिसर भक्ति के रस में डूब गया। कपाट खुलने के ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने के लिए सबसे पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनके साथ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भगवान के दिव्य दर्शन किए।
अखंड ज्योति और भक्तों का सैलाब
कपाट खुलने के समय मंदिर परिसर में करीब 2 हजार लोग मौजूद थे, लेकिन अनुमान है कि आज पहले ही दिन लगभग 7 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचेंगे। बद्रीनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता अखंड ज्योति है। शीतकाल में जब छह महीने के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब यह ज्योति गर्भगृह में निरंतर जलती रहती है। कपाट खुलने पर श्रद्धालु सबसे पहले इसी अखंड ज्योति के दर्शन करते हैं, जिसे भगवान की सतत उपस्थिति और जागृत शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस ज्योति के दर्शन के बाद ही आगे की पूजा-अर्चना और अभिषेक की प्रक्रिया शुरू होती है।
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा
भगवान श्रीहरि विष्णु की पवित्र भूमि श्री बदरीनाथ धाम के कपाटोद्घाटन के शुभ अवसर पर उपस्थित रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हिमालय की गोद में स्थित यह दिव्य धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा, सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इस पावन अवसर पर अलौकिक भक्ति, दिव्य ऊर्जा और अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति ने मन को भावविभोर कर दिया।
इस अवसर पर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने पीएम नरेन्द्र मोदी जी के नाम से श्री हरि विष्णु की प्रथम पूजा की और सम्पूर्ण विधि विधान के साथ श्री बदरी विशाल का वंदन कर प्रदेशवासियों के सुख-समृद्धि एवं मंगल हेतु प्रार्थना की।
भू-वैकुण्ठ-कृतं वासं देवदेवं जगत्पतिम्।
चतुर्वर्ग-प्रदातारं श्रीबदरीशं नमाम्यहम् ॥भगवान श्रीहरि विष्णु की पवित्र भूमि श्री बदरीनाथ धाम के कपाटोद्घाटन के शुभ अवसर पर उपस्थित रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हिमालय की गोद में स्थित यह दिव्य धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा,… pic.twitter.com/YZ2iSrebDQ
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) April 23, 2026

घृत कंबल: आने वाले साल की खुशहाली का संकेत
बद्रीनाथ धाम की परंपराओं में ‘घृत कंबल’ का महत्व सबसे अनोखा है। कपाट बंद होने के समय भगवान बद्रीविशाल की प्रतिमा को एक विशेष कंबल ओढ़ाया जाता है। इस साल जब कपाट खुले और यह कंबल हटाया गया, तो पूर्व धर्माधिकारी आचार्य भुवन चंद्र उनियाल ने एक सुखद संदेश दिया। उन्होंने बताया कि इस वर्ष कंबल घी से लबालब (गीला) मिला है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कंबल में घी का सही स्थिति में मिलना इस बात का संकेत है कि आने वाले पूरे साल मौसम अनुकूल रहेगा, फसलें अच्छी होंगी और देश में सुख-समृद्धि बनी रहेगी।
कैसे बनता है यह खास घृत कंबल?
यह कोई साधारण कंबल नहीं होता। इसे माणा गांव की कुंवारी लड़कियां एक ही दिन का उपवास रखकर तैयार करती हैं। ऊन से बने इस कंबल को बद्री गाय के शुद्ध देसी घी में अच्छी तरह डुबोया जाता है। शीतकाल के दौरान, जब तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है और भारी बर्फबारी होती है, तब भी यह घी जमता नहीं है। यह घी भगवान की प्रतिमा की सुरक्षा करता है। अगर कपाट खुलने पर कंबल सूखा या फटा हुआ मिले, तो इसे भविष्य के लिए अशुभ या प्राकृतिक आपदाओं का संकेत माना जाता है।

अब पूर्ण हुई चारधाम यात्रा
बद्रीनाथ धाम के द्वार खुलते ही अब उत्तराखंड के चारों धामों (गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) के कपाट श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह खुल चुके हैं।
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गंगोत्री और यमुनोत्री: 19 अप्रैल (अक्षय तृतीया) को खुले।
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केदारनाथ: 22 अप्रैल को खुले।
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बद्रीनाथ: 23 अप्रैल को खुले।
सरकार ने इस वर्ष यात्रा को और अधिक सुगम बनाने के दावे किए हैं। साल 2025 में करीब 51 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने दर्शन किए थे, और इस साल अभी तक 21 लाख से ज्यादा लोग अपना रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं। मुख्यमंत्री धामी ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए सभी श्रद्धालुओं से यात्रा के नियमों का पालन करने और सुगम यात्रा की कामना की है।

18 क्विंटल फूलों से महका बद्री विशाल का द्वार
इस वर्ष मंदिर की सजावट देखने लायक है। बद्री-केदार पुष्प सेवा समिति, ऋषिकेश के सहयोग से मंदिर को करीब 18 क्विंटल रंग-बिरंगे फूलों से सजाया गया है। फूलों की इस भव्य सजावट ने पूरे परिसर में एक उत्सव जैसा माहौल बना दिया है। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उत्सव का अनुभव बन गया है।

क्यों पड़ा ‘बद्रीनाथ’ नाम? जानिए पौराणिक कथा
मंदिर के नाम के पीछे एक बहुत ही सुंदर पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु हिमालय की कड़ाके की ठंड में तपस्या कर रहे थे, तब वे भारी बर्फबारी से पूरी तरह ढक गए थे। उनकी इस कठोर तपस्या को देखकर माता लक्ष्मी द्रवित हो गईं और उन्होंने बद्री (बेर) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया। उन्होंने स्वयं को वृक्ष बनाकर भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और बर्फ से बचाया।
जब भगवान विष्णु की तपस्या पूरी हुई, तो उन्होंने माता लक्ष्मी के इस समर्पण को देखकर प्रसन्न होकर कहा कि इस स्थान पर अब से उनकी पूजा माता लक्ष्मी के साथ ही होगी। चूंकि माता ने ‘बद्री’ वृक्ष बनकर उनकी रक्षा की, इसलिए भगवान विष्णु को यहाँ ‘बद्री के नाथ’ यानी बद्रीनाथ के नाम से पुकारा जाने लगा।
बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलना न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारत के लिए आस्था का महापर्व है। घृत कंबल से मिलने वाले सकारात्मक संकेतों ने श्रद्धालुओं के उत्साह को और बढ़ा दिया है। यदि आप भी इस वर्ष यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो प्रशासन द्वारा जारी गाइडलाइंस का पालन जरूर करें और भगवान बद्रीविशाल के दिव्य दर्शनों का लाभ उठाएं।
जय बद्रीविशाल!
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