Rising screen time among children: आजकल हर घर की सबसे बड़ी समस्या बच्चों की मोबाइल और टैबलेट की लत बन गई है। बच्चे पार्क में खेलने की बजाय स्क्रीन के सामने घंटों बिता रहे हैं। अब इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी गहरी चिंता जाहिर की है। कोर्ट का कहना है कि बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए फिजिकल एक्टिविटी और खेलकूद बहुत जरूरी हैं।
खेलों को मौलिक अधिकार बनाने की मांग
Supreme court में ‘स्पोर्ट्स: अ वे ऑफ लाइफ’ एनजीओ के अध्यक्ष डॉ. कनिष्का पांडे की याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस याचिका में मांग की गई है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत खेलों को बच्चों का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि पढ़ाई और खेलकूद के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर तक खेलों को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए और स्कूलों के बजट में इसके लिए अलग फंड तय हो।
Amicus curiae की रिपोर्ट और कोर्ट का रुख
मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) ने भी सिफारिश की है कि हर स्कूल में शारीरिक गतिविधियों को अनिवार्य किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता से जवाब मांगा है और अब मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। कोर्ट ने माना कि डिजिटल दौर में बच्चे खेल के मैदानों से दूर होते जा रहे हैं, जो चिंताजनक है।
बढ़ता screen time और सेहत पर असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भाषाई विकास पर बुरा असर पड़ता है। 2 साल से छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम शून्य होना चाहिए। कोर्ट के इस कड़े रुख से उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में स्कूलों में खेलकूद को पढ़ाई के बराबर ही दर्जा मिलेगा।







