Gyanvapi Case : वाराणसी के बहुचर्चित Gyanvapi Case में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार शुरू हुई मध्यस्थता (Mediation) की प्रक्रिया पूरी तरह विफल हो गई है। मंगलवार को मध्यस्थता अदालत में इस मामले से जुड़ी चार अहम पत्रावलियों (Files) पर सुनवाई पूरी हुई। इस दौरान हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने किसी भी तरह के समझौते या बीच-बचाव के रास्ते को अपनाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। दोनों पक्षों ने अदालत के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी कानूनी लड़ाई को आगे जारी रखेंगे और अब अदालत का जो भी अंतिम निर्णय होगा, वही उन्हें सर्वमान्य होगा।
दोनों पक्षों ने अदालत में क्या कहा?
मध्यस्थता कोर्ट में चली इस गंभीर चर्चा के दौरान मंदिर और मस्जिद दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी बातों पर दृढ़ता दिखाई। शुरुआत में ऐसी अफवाहें थीं कि मुस्लिम पक्ष इस वार्ता का बहिष्कार कर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के प्रतिनिधि और उनके अधिवक्ता इस प्रक्रिया में शामिल होने पहुंचे थे।
वहीं, हिंदू पक्ष की ओर से रेखा पाठक और शैलेंद्र पाठक जैसे प्रमुख चेहरे अपने वकीलों के साथ मौजूद रहे। हिंदू पक्ष ने दोटूक शब्दों में कहा कि वह स्थान आदिकाल से उनका मंदिर है और उन्हें वहां नियमित पूजा-पाठ का पूरा अधिकार चाहिए, इसलिए समझौते का कोई सवाल ही नहीं उठता। इस कानूनी मोड़ ने Gyanvapi Case को एक बार फिर पूरी तरह से अदालती कार्यवाही पर केंद्रित कर दिया है।
क्या है पूरा विवाद?
वाराणसी में श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा यह विवाद सदियों पुराना और बेहद संवेदनशील है। मंदिर पक्ष का लगातार यह दावा रहा है कि वर्तमान ढांचे के नीचे आदि-विश्वेश्वर का मूल ज्योतिर्लिंग और भव्य मंदिर मौजूद है, जिसे 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर तोड़ा गया था। इस दावे को मजबूत करने के लिए इतिहास के पन्नों और हाल ही में हुए एएसआई (ASI) सर्वे की रिपोर्ट का हवाला दिया जाता है।
दूसरी ओर, मस्जिद पक्ष का कहना है कि यह जमीन सदियों से वक्फ की संपत्ति है और यहां लंबे समय से नमाज अदा की जा रही है। मस्जिद कमेटी इस विवाद में ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ (Places of Worship Act) को ढाल बनाती है, जो आजादी के समय के धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है।
अब आगे क्या होगा?
अदालत के आदेश पर हुए एएसआई सर्वे में मंदिर से जुड़े कई अवशेष, खंभे और मूर्तियां मिलने का दावा किया गया है, जिसने इस मुकदमे को और अधिक पेचीदा बना दिया है। शैलेंद्र पाठक ने अदालत में यह भी ध्यान दिलाया कि ज्ञानवापी परिसर के व्यास जी के तलगृह में कोर्ट के आदेश के बाद से पूजा-पाठ पहले से ही चल रहा है।
अब चूंकि मध्यस्थता का रास्ता बंद हो चुका है, इसलिए Gyanvapi Case का भविष्य पूरी तरह से कानूनी दलीलों पर टिक गया है। फिलहाल यह ऐतिहासिक Gyanvapi Case वाराणसी जिला अदालत, इलाहाबाद हाई कोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष विचाराधीन है, जहां आने वाले दिनों में नियमित सुनवाई जारी रहेगी।
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