Sushmita Dev resigns: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हर रोज एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। चुनाव नतीजों के बाद से राज्य के सियासी गलियारों में मची हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर की कलह अब पूरी तरह से सड़कों पर आ चुकी है। एक समय जो नेता ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद माने जाते थे, वे अब धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक की सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है।
राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव का बड़ा कदम
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आया यह नया मोड़ हर किसी को चौंका रहा है। ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वाली राज्यसभा सांसद Sushmita Dev ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने न केवल राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी, बल्कि पार्टी से भी दूरी बना ली है। सुष्मिता देव का यह कदम टीएमसी के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का एक प्रमुख चेहरा थीं। हालांकि, उन्होंने अपने इस फैसले के पीछे कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीति में जो दिखता है, कहानी सिर्फ उतनी नहीं होती।

इस्तीफे के बाद की इस मुलाकात ने बढ़ाई हलचल
सुष्मिता देव के इस कदम से ज्यादा चर्चा उनके अगले कदम की हो रही है। वे अपने इस्तीफे के तुरंत बाद असम सीएम से मिलीं। सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाकात की और दोनों नेताओं की बातचीत की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आते ही कयासों का दौर शुरू हो गया। भले ही इस मुलाकात को एक औपचारिक या शिष्टाचार भेंट कहा जा रहा हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि सुष्मिता देव जल्द ही बीजेपी का दामन थाम सकती हैं।
TMC के भीतर बढ़ता आंतरिक कलह
यह कोई पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी को अपने ही लोगों से चुनौती मिल रही है। दरअसल, टीएमसी पहले से ही अंदरूनी असंतोष और अपनों के बागी रुख का सामना कर रही है। विधानसभा चुनावों के बाद से ही पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। शीर्ष नेतृत्व से नेताओं की नाराजगी इस कदर बढ़ गई है कि महज कुछ ही समय के भीतर एक के बाद एक हो रहे इस्तीफे ने ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सुष्मिता देव से ठीक पहले सुखेंदु शेखर राय जैसे बड़े नेता ने भी पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था।

क्या कमजोर पड़ रहा है ममता बनर्जी का किला?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी का मजबूत किला अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। ऐसा लग रहा है मानो ताश की तरह बिखर रही TMC को संभालना अब शीर्ष नेतृत्व के बस में नहीं रहा। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेता लगातार बगावत पर उतर आए हैं। विधायकों के बाद अब पार्टी के सांसदों में भी बड़ी टूट की खबरें पक्की होती दिख रही हैं। बागी गुटों के दावों ने ममता बनर्जी के खेमे में हड़कंप मचा दिया है।
क्या दिल्ली में बदलेगा समीकरण?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये बागी सांसद NDA के साथ जा सकते हैं? टीएमसी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से लगभग 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर संसद में अपने लिए अलग व्यवस्था की मांग की है। ये सभी बागी सांसद बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को अपना समर्थन देने का मन बना चुके हैं। इन सांसदों में शताब्दी रॉय, बापी हलदर, अरूप चक्रवर्ती, जून मालिया और दीपक अधिकारी (देव) जैसे कई बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
देखा जाए तो पश्चिम बंगाल की सत्ता में आए बदलाव के बाद से टीएमसी का आंतरिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। सुष्मिता देव का इस्तीफा और असम के मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले दिनों में बंगाल ही नहीं, बल्कि देश की संसद में भी बहुत कुछ बदलने वाला है। अब देखना यह होगा कि ममता बनर्जी अपने इस बिखरते कुनबे को बचाने के लिए क्या रणनीति अपनाती हैं।
