हमारे देश की गलियों और सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते पिछले कुछ समय से एक बहुत बड़ी बहस का हिस्सा बने हुए हैं। एक तरफ मासूम बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ जानवरों के प्रति दया और उनके अधिकारों की बात। इस गंभीर और संवेदनशील विषय पर आज देश की सबसे बड़ी अदालत यानी Supreme Court अपना अंतिम फैसला सुनाने जा रही है। पिछले काफी समय से इस मुद्दे पर कोर्ट में तीखी बहसें चल रही हैं, जिसमें डॉग बाइट, रेबीज, शेल्टर होम की कमी और आम लोगों की सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा हुई है। आज का दिन यह तय करने के लिए बहुत बड़ा है कि हमारी सड़कें कितनी सुरक्षित होंगी और बेजुबानों का भविष्य क्या होगा। आइए समझते हैं कि इस पूरे मामले में अब तक क्या-क्या हुआ है।
कैसे शुरू हुआ यह पूरा मामला?
इस कहानी की शुरुआत पिछले साल जुलाई में हुई थी। 28 जुलाई 2025 को एक मीडिया रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें देश में बढ़ते डॉग बाइट और उसके कारण होने वाली रेबीज की घटनाओं का जिक्र किया गया था। इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे आंकड़े थे जिन्हें देखकर कोई भी परेशान हो सकता था। Supreme Court ने इस मीडिया रिपोर्ट का खुद संज्ञान लिया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस खबर को बेहद चिंताजनक माना। कोर्ट का कहना था कि दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में हर दिन सैकड़ों लोगों को कुत्ते काट रहे हैं। इससे रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी फैल रही है और सबसे ज्यादा नुकसान मासूम बच्चों और बुजुर्गों को उठाना पड़ रहा है। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
शुरुआती कड़े निर्देश और शेल्टर होम की बहस
मामले की गंभीरता को देखते हुए Supreme Court ने 11 अगस्त 2025 को दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के अधिकारियों को एक बड़ा आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें डॉग शेल्टर में भेजने का काम तुरंत शुरू किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने यह चेतावनी भी दी कि अगर कोई व्यक्ति या संस्था इस काम में बाधा डालेगी, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने यहां तक कहा कि अगर जरूरत पड़े, तो अधिकारी बल का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
शुरुआत में कोर्ट का रुख बेहद सख्त था। उनका कहना था कि एक बार पकड़े जाने के बाद इन कुत्तों को दोबारा सार्वजनिक जगहों पर न छोड़ा जाए। इस दौरान कोर्ट ने कहा था:
“शिशु और छोटे बच्चे किसी भी कीमत पर रेबीज का शिकार नहीं बनने चाहिए। इस कार्रवाई से लोगों में यह भरोसा पैदा होना चाहिए कि वे सड़कों पर बिना किसी डर के घूम सकते हैं। इस मामले में किसी भी तरह की भावुकता को बीच में नहीं लाया जाना चाहिए।”
इस आदेश के बाद एनिमल राइट्स कार्यकर्ताओं और डॉग लवर्स के बीच खलबली मच गई। इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गईं और इस सख्त निर्देश पर रोक लगाने की मांग की गई। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस आदेश पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि स्थानीय निकायों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
कोर्ट के रुख में बदलाव: नसबंदी और टीकाकरण का आदेश
जब जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने अपनी दलीलें कोर्ट के सामने रखीं, तो Supreme Court ने स्थिति को व्यावहारिक तरीके से समझने की कोशिश की। 22 अगस्त 2025 को कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में एक बड़ा बदलाव किया।
नए फैसले में कोर्ट ने माना कि सभी आवारा कुत्तों को हमेशा के लिए शेल्टर होम में बंद रखना मुमकिन नहीं है। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि पकड़े गए कुत्तों की नसबंदी (Sterilization) और टीकाकरण (Vaccination) किया जाए, और फिर उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ दिया जाए जहां से उन्हें उठाया गया था। हालांकि, जो कुत्ते बहुत ज्यादा आक्रामक, खतरनाक या रेबीज से पीड़ित हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से शेल्टर होम में ही रखने की बात कही गई।
सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा के लिए नए कदम
इसके बाद भी मामला थमा नहीं। 7 नवंबर 2025 को Supreme Court ने जनता की सुरक्षा से जुड़े दो बड़े मुद्दों पर ध्यान दिया—पहला आवारा कुत्तों के हमले और दूसरा सड़कों पर घूमने वाले मवेशियों के कारण होने वाले एक्सीडेंट।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसे संवेदनशील स्थानों से आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटाया जाए। इसके साथ ही इन सभी संस्थानों को निर्देश दिया गया कि वे अपने परिसरों की उचित बाड़बंदी (Fencing) करें ताकि आवारा जानवर अंदर न घुस सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाने के लिए जगह तय होनी चाहिए, हर कहीं सड़क पर खाना खिलाने से बचना चाहिए।
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क्या कुत्तों को खाना खिलाने वाले होंगे जिम्मेदार?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ इस साल 13 जनवरी को हुई सुनवाई में आया। Supreme Court ने संकेत दिया कि अगर कोई आवारा कुत्ता किसी राहगीर पर हमला करता है, तो उसे खाना खिलाने वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को भारी मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्यों पर डाली जा सकती है।
बेंच ने एक तल्ख टिप्पणी करते हुए सवाल किया था कि जो लोग आवारा कुत्तों से इतना प्यार करते हैं और उन्हें खाना खिलाते हैं, वे जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन जानवरों को अपने घरों के अंदर क्यों नहीं रख लेते? इस टिप्पणी ने इस बहस को एक नया रूप दे दिया।
फैसला सुरक्षित और आज का इंतजार
आखिरकार, दोनों पक्षों की लंबी दलीलों के बाद 28 जनवरी 2026 को Supreme Court ने इस पूरे मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और डॉग बाइट के पीड़ितों, सभी की बातों को विस्तार से सुना था। सभी पक्षों को अपनी लिखित दलीलें जमा करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया था।
आज जब कोर्ट अपना अंतिम निर्णय सुनाने जा रहा है, तो पूरे देश की नजरें इस पर टिकी हैं। क्या कोर्ट नसबंदी और टीकाकरण के नियमों को और सख्त करेगा? क्या सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों को खाना खिलाने के नियम बदलेंगे? इन सभी सवालों के जवाब आज मिल जाएंगे।
आवारा कुत्तों का मुद्दा बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह एक तरफ इंसानी जान और जन सुरक्षा से जुड़ा है, तो दूसरी तरफ बेजुबान जानवरों के जीने के अधिकार से। सड़कों पर चलने वाले राहगीर, खासकर बच्चे और बुजुर्ग, सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं; वहीं पशु प्रेमी चाहते हैं कि इन जानवरों के साथ क्रूरता न हो। Supreme Court का आज आने वाला फैसला देश में पशु नियंत्रण नीतियों और नागरिक सुरक्षा के बीच एक नया संतुलन बनाने का काम करेगा। उम्मीद है कि अदालत का निर्णय ऐसा होगा जिससे समाज में सुरक्षा भी बनी रहे और जानवरों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण भी कम न हो।







