शिक्षा बनाम परंपरा! ललितपुर के करीला गांव में पहली बार 10वीं पास हुई बिटिया

ललितपुर

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ललितपुर के करीला गांव से शिक्षा की उम्मीद जगाने वाली खबर है। सहरिया जनजाति की नेहा और राखी इस गांव की पहली बेटी बनी, जिसने हाईस्कूल की परीक्षा पास की। मजदूर परिवार की ये बेटियां दोनों अब शिक्षिका बनने का सपना देख रही हैं। ये कहानी है हौसले की, संघर्ष की और सपनों को सच करने की, यह वो इलाका है जहां पीढ़ियों से बेटियों की पढ़ाई को सपना माना जाता रहा। जहां स्कूल की दहलीज़ तक पहुंचना भी बड़ी बात थी लेकिन तालबेहट विकासखंड के करीला गांव में सहरिया जनजाति की एक बेटी ने इतिहास रच दिया है मजदूर मां-बाप के संघर्ष को अपनी ताकत बनाकर नेहा इस गांव की पहली बेटी बनी, जिसने हाईस्कूल की परीक्षा पास की, नेहा ने न सिर्फ 65 प्रतिशत अंक हासिल किए, बल्कि अपनी इस कामयाबी से छोटी बहन राखी के लिए भी पढ़ाई का रास्ता खोल दिया है।

सहरिया बस्ती में शिक्षा की जिद

ललितपुर जिले के तालबेहट तहसील क्षेत्र में स्थित करीला गांव सहरिया जनजाति की बस्ती है, जहां शिक्षा आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। जंगल और तालाबों से घिरे इस गांव में करीब 300 परिवार रहते हैं। अधिकांश लोगों के पास सरकारी आवास, बिजली, शौचालय, सड़क और राशन जैसी सुविधाएं तो हैं, लेकिन शिक्षा का स्तर बेहद कमजोर है।

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पांचवीं के बाद पढ़ाई छूट जाती है

करीला गांव में आमतौर पर बच्चे—चाहे लड़के हों या लड़कियां—पांचवीं या आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर काम-धंधे में लग जाते हैं। कई युवक रोज़गार की तलाश में गांव से बाहर चले जाते हैं। ऐसे माहौल में दो सगी बहनों का हाईस्कूल तक पहुंचना पूरे गांव के लिए मिसाल बन गया है।

नेहा और राखी की अलग पहचान

करीला गांव की नेहा और राखी ने परंपराओं की सीमाएं तोड़ते हुए शिक्षा को चुना। नेहा ने 65 प्रतिशत अंकों के साथ हाईस्कूल पास कर 11वीं में दाखिला लिया है, जबकि उसकी छोटी बहन राखी इस साल हाईस्कूल की परीक्षा की तैयारी कर रही है। दोनों का सपना शिक्षक बनकर गांव की बेटियों को पढ़ाना और शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना है।

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मां बनी हौसले की ताकत

दोनों बहनों के पिता चाहते थे कि वे खेतों में काम करें, लेकिन उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। नेहा बताती है कि जरूरत पड़ने पर वे खेतों में मजदूरी भी करती हैं, मगर रात में नियमित पांच घंटे पढ़ाई जरूर करती हैं। गांव वालों के ताने और विरोध भी मां के समर्थन के आगे टिक नहीं पाए।

मुफ्त पढ़ाने की चाह, सामाजिक रुकावट

नेहा चाहती है कि बस्ती की करीब 25 बच्चियां पढ़ाई करें। वह शाम को निशुल्क ट्यूशन पढ़ाने की कोशिश भी करती है, लेकिन अधिकतर परिवार अपनी बेटियों को भेजने से हिचकते हैं। फिर भी दो-चार बच्चियां रोज़ पढ़ने आ जाती हैं।

अन्य बस्तियों में भी हालात समान

करीला जैसी ही स्थिति जमालपुर की सहरिया बस्ती की है, जहां लगभग 25 परिवार रहते हैं। यहां सरकारी आवास बने हैं, लेकिन अधिकतर घरों में ताले लगे हैं क्योंकि लोग रोज़गार के लिए मध्य प्रदेश चले गए हैं। गांव में मिली दुल्ली बताती हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं, जिन्होंने पांचवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। समाज में यह डर बना रहता है कि ज्यादा पढ़ाई करने से बेटियों के विवाह में परेशानी आती है।

पढ़ाई के साथ समाज की चिंता

गांव की 60 वर्षीय रामप्यारी कहती हैं कि बेटियों का पढ़ना अच्छी बात है, लेकिन आगे शादी-ब्याह की चिंता समाज को पीछे खींच लेती है। यही सोच सहरिया बस्तियों में शिक्षा के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

करीला गांव जहां अब तक बच्चों की पढ़ाई पांचवीं या आठवीं तक ही सिमट जाती थी। वहीं नेहा और राखी ने उम्मीद की एक नई लकीर खींच दी है अब नेहा और राखी पीएम श्री राजकीय बालिका इंटर कॉलेज तालबेहट में 11वीं की पढ़ाई कर शिक्षिका बनने का सपना पूरा करने में जुटी हैं वहीं, इन बहनों की कामयाबी अब पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन चुकी है। बस्ती में बेटियों के पढ़ाई के प्रति बढ़ते जुनून को देखकर शिक्षा जगत से लेकर जनप्रतिनिधि तक इन बहनों की जमकर तारीफ कर रहे हैं।

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