Janmashtami का नाम आते ही हमारे मन में बाल कृष्ण की नटखट तस्वीरें तैरने लगती हैं। कान्हा का मुस्कुराता चेहरा, उनकी शरारतें और दोस्तों के साथ माखन चुराना, यह सब आज भी हमारे दिल के बहुत करीब है। जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन मनाई जाने वाली दही हांडी की परंपरा इसी बाल लीला से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं कि यह परंपरा कैसे शुरू हुई और इसके पीछे क्या कहानी है।
माखन प्रेम और गोपियों की परेशानी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण को बचपन से ही माखन और दही बहुत पसंद था। वे अपने सखाओं के साथ गोकुल की गलियों में घूमते थे और मौका मिलते ही गोपियों के घर में रखी माखन की मटकी खाली कर देते थे। कान्हा और उनके दोस्तों की इस नटखट आदत से गोपियां परेशान हो गई थीं। वे समझ नहीं पा रही थीं कि अपने माखन को इस बाल-टोली से कैसे बचाकर रखा जाए।
ऊंचाई पर मटकी और मानव पिरामिड
गोपियों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने माखन की मटकियों को जमीन से काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया ताकि बच्चों के हाथ वहां तक न पहुंच सकें। लेकिन नटखट कान्हा भी आसानी से हार मानने वाले कहां थे। उन्होंने अपने दोस्तों को इकट्ठा किया और एक नया रास्ता निकाला। वे एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बना लेते थे। सबसे ऊपर पहुंचने वाला साथी मटकी फोड़ देता था और फिर सभी मिलकर माखन का आनंद लेते थे।
आज के दौर में दही हांडी का रंग
दही हांडी के उत्सव में इसी बाल लीला को प्रतीकात्मक रूप से दोहराया जाता है। एक मटकी में दही, मक्खन और दूसरी चीजें भरकर उसे रस्सी की मदद से काफी ऊंचाई पर बांध दिया जाता है। इसके बाद युवाओं की टोली, जिसे हम गोविंदा कहते हैं, मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुंचने की कोशिश करती है। महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में इस दिन काफी ऊंची-ऊंची मटकियां बांधी जाती हैं। ढोल-नगाड़ों की ताल और जयकारों के बीच जब गोविंदा मटकी फोड़ते हैं, तो पूरा माहौल खुशी से सराबोर हो जाता है।







