Chandrayaan-2 Mission: 22 जुलाई की तारीख भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और देशवासियों के लिए बेहद खास है। वर्ष 2019 में आज ही के दिन भारत ने अपने दूसरे चंद्र अभियान, यानी चंद्रयान-2 मिशन को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में रवाना किया था।
यह केवल एक सैटेलाइट का प्रक्षेपण नहीं था, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता, स्वदेशी तकनीक और चंद्रमा को गहराई से जानने के सपने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम था। हालांकि रास्ते में कुछ चुनौतियां आईं, लेकिन इस प्रयास ने भारत को अंतरिक्ष की दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई।
श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष तक का सफर
22 जुलाई 2019 को दोपहर 2:43 बजे भारत के सबसे भारी रॉकेट GSLV Mk-III M1 ने चंद्रयान-2 को लेकर उड़ान भरी थी। इसके बाद अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। वैज्ञानिकों ने बड़ी सावधानी से कई अर्थ-बाउंड मैन्युवर्स (Earth Bound Manoeuvres) पूरे किए, जिससे धीरे-धीरे इसकी कक्षा का दायरा बढ़ता गया।
14 अगस्त 2019 को यान ने लूनर ट्रांसफर ट्रैजेक्टरी में प्रवेश किया और चंद्रमा की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। इसके बाद 20 अगस्त 2019 को लूनर ऑर्बिट इंसर्शन (LOI) की प्रक्रिया पूरी हुई। इसके साथ ही अंतरिक्ष यान चंद्रमा की एक अंडाकार कक्षा में स्थापित हो गया। बाद में कई छोटी-छोटी प्रक्रियाओं के जरिए इसे चंद्रमा की 100×100 किलोमीटर की ध्रुवीय वृत्ताकार कक्षा में पहुंचा दिया गया।
मिशन के प्रमुख हिस्से और इनका उद्देश्य
इस महत्वाकांक्षी योजना के तीन मुख्य घटक थे:
-
ऑर्बिटर: जिसका काम चंद्रमा के चक्कर लगाते हुए उसकी सतह का अध्ययन करना था।
-
विक्रम लैंडर (Vikram lander): जिसे चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से उतरना था।
-
प्रज्ञान रोवर (pragyan rover): जो लैंडर से बाहर निकलकर चंद्रमा की सतह पर चहलकदमी करते हुए आंकड़े जुटाने के लिए बनाया गया था।
इन सभी का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास का अध्ययन करना था। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां इससे पहले दुनिया के किसी भी देश ने सॉफ्ट लैंडिंग करने की कोशिश नहीं की थी।
लैंडर से संपर्क टूटने का दौर
2 सितंबर 2019 को विक्रम लैंडर अपने मुख्य ऑर्बिटर से अलग हो गया। इसके बाद इसकी कक्षा को घटाकर 35×101 किलोमीटर किया गया ताकि लैंडिंग की तैयारी की जा सके।
7 सितंबर 2019 को तड़के विक्रम लैंडर ने चंद्रमा की सतह की ओर उतरना शुरू किया। 35 किलोमीटर की ऊंचाई से शुरू हुआ यह सफर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी तक बिल्कुल योजना के अनुसार चला। सभी सेंसर और उपकरण सही तरीके से काम कर रहे थे, लेकिन बिल्कुल अंतिम चरण में लैंडर और ग्राउंड स्टेशन के बीच संपर्क टूट गया।
भले ही विक्रम लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाई, लेकिन इस दौरान इस्तेमाल की गई तकनीक (जैसे वेरिएबल थ्रस्ट प्रोपल्शन) ने अपनी क्षमता साबित की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ऑर्बिटर पूरी तरह सुरक्षित रहा और उसने अपना काम जारी रखा।
वैज्ञानिक डेटा और मिली नई जानकारियां
ऑर्बिटर ने चंद्रमा की कक्षा में रहकर लगातार महत्वपूर्ण जानकारियां पृथ्वी पर भेजीं। इसरो ने जब इसके आंकड़े साझा किए, तो कई नई बातें सामने आईं:
-
आर्गन-40 गैस का अध्ययन: CHACE-2 पेलोड ने चंद्रमा के मध्य-अक्षांश और दक्षिणी ध्रुव क्षेत्रों में आर्गन-40 गैस के फैलाव का अध्ययन किया, जिससे वहां के पतले वातावरण को समझने में मदद मिली।
-
सटीक मैपिंग: TMC-2 कैमरे ने चंद्रमा की सतह पर मौजूद भूगर्भीय संरचनाओं के उच्च-रिज़ॉल्यूशन नक्शे तैयार किए।
-
सौर गतिविधियों की जांच: XSM पेलोड ने सूर्य से निकलने वाले B-क्लास सोलर फ्लेयर्स और उनके दौरान मैग्नीशियम, एल्युमिनियम व सिलिकॉन जैसे तत्वों में आए बदलावों का रिकॉर्ड जुटाया।
भविष्य के अभियानों का मजबूत आधार
विज्ञान में कोई भी प्रयास बेकार नहीं जाता। चंद्रयान-2 मिशन से मिली सीख और जुटाए गए डेटा ने भारत के अगले चरण की नीव रखी। इसी अनुभव के दम पर 2023 में चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक कदम रखा और भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना।
लॉन्च के सालों बाद भी 22 जुलाई का दिन हमें यह याद दिलाता है कि असफलताएं ही सफलता का रास्ता तैयार करती हैं। भारत के अंतरिक्ष सफर में इस दिन का महत्व हमेशा बना रहेगा।







