कोयंबटूर: दक्षिण भारत की राजनीति में इस समय एक नई बहस छिड़ गई है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए उन तमाम आशंकाओं और आरोपों का जवाब दिया है, जो पिछले कुछ समय से परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण बिल को लेकर चर्चा में थे। नायडू का यह दौरा केवल एक चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के राजनीतिक भविष्य की एक स्पष्ट रूपरेखा पेश करने वाला साबित हुआ है।
महिला आरक्षण बिल: तीन दशकों की रुकावट और न्याय की गुहार
चंद्रबाबू नायडू ने अपने संबोधन की शुरुआत महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण से की। उन्होंने विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष को आड़े हाथों लिया। नायडू ने आरोप लगाया कि जो पार्टियां आज महिला अधिकारों की बात कर रही हैं, उन्होंने ही 1996 से लेकर अब तक इस बिल को संसद में लटकाए रखा।
उन्होंने कहा कि यह “सुधार-विरोधी ताकतों” की एक सोची-समझी साजिश थी, जिसके कारण देश की आधी आबादी को लगभग तीन दशकों तक न्याय के लिए इंतजार करना पड़ा। नायडू ने जोर देकर कहा कि मौजूदा नेतृत्व के तहत केंद्र सरकार न केवल सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए काम कर रही है, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही है कि उन बढ़ी हुई सीटों में महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य हो।
परिसीमन का डर बनाम सीटों की हकीकत
दक्षिण भारत के राज्यों में अक्सर यह डर जताया जाता है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल करने के कारण भविष्य में होने वाले परिसीमन से उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण की ताकत कम हो जाएगी। इस डर को सिरे से खारिज करते हुए चंद्रबाबू नायडू ने सीटों का एक विस्तृत खाका पेश किया। उन्होंने समझाया कि लोकसभा सीटों में प्रस्तावित 50% की वृद्धि से किसी राज्य का नुकसान नहीं, बल्कि सबका फायदा होगा।
उनके द्वारा पेश किए गए अनुमानित आंकड़ों के अनुसार:
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दक्षिण भारत की कुल सीटें: मौजूदा 130 सीटों से बढ़कर लगभग 195 तक पहुंचने की संभावना है।
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तमिलनाडु का परिदृश्य: राज्य की मौजूदा 39 लोकसभा सीटें बढ़कर 59 हो सकती हैं।
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आंध्र प्रदेश का परिदृश्य: यहां की 25 सीटें बढ़कर 38 तक जाने का अनुमान है।
नायडू का तर्क है कि जब कुल सीटों का दायरा बढ़ेगा, तो दक्षिण का आनुपातिक हिस्सा भी सुरक्षित रहेगा और साथ ही क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में भी मजबूती आएगी।
जनगणना 2026 और परिसीमन पर कड़ा रुख
विपक्ष की उस मांग पर नायडू ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें 2026-27 की नई जनगणना को परिसीमन का आधार बनाने की बात कही जा रही है। नायडू ने इसे दक्षिण भारत के साथ विश्वासघात करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या स्थिरता के राष्ट्रीय लक्ष्य को बखूबी पूरा किया है, उन्हें कम सीटें देकर सजा नहीं दी जा सकती।
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि उस समय भी उन्होंने इसी मुद्दे पर लड़ाई लड़ी थी। उसी कड़े विरोध के कारण 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों को फ्रीज (Freeze) करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया था। नायडू ने साफ कहा कि किसी भी नए प्रस्ताव में यह अनिवार्य होना चाहिए कि किसी भी राज्य का मौजूदा प्रतिनिधित्व कम न हो, भले ही कुल सीटों की संख्या बढ़ा दी जाए।
विपक्ष पर तीखा प्रहार और भविष्य की रणनीति
अपने संबोधन के दौरान नायडू ने कांग्रेस और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को “दक्षिण का दुश्मन” बताते हुए चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि विपक्ष जानबूझकर डर का माहौल पैदा कर रहा है ताकि लोगों को गुमराह किया जा सके। उनके मुताबिक, 2026 का परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे संतुलन के साथ लागू करना होगा।
नायडू ने कोयंबटूर की जनता से अपील की कि वे उन ताकतों को पहचानें जो विकास की राह में रोड़ा अटकाती रही हैं। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को अब राजनीतिक मजबूती की भी जरूरत है, जो केवल तभी संभव है जब केंद्र और राज्य के बीच एक सकारात्मक तालमेल हो।
चंद्रबाबू नायडू का यह बयान केवल एक चुनावी भाषण नहीं है, बल्कि यह आने वाले सालों में दक्षिण भारत की राजनीति की दिशा तय करेगा। परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्टता ने न केवल समर्थकों में उत्साह भरा है, बल्कि विरोधियों को भी नए सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
कोयंबटूर की इस रैली ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में विकास, क्षेत्रीय हित और राष्ट्रीय एकता का संतुलन ही चुनावों का मुख्य एजेंडा रहने वाला है। अब देखना यह है कि दक्षिण भारत के अन्य दल नायडू के इन तर्कों और आंकड़ों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।







