Baba Baidyanath Jyotirlinga Mandir Deoghar: सावन का पवित्र महीना चल रहा है और चारों तरफ शिव भक्तों का उत्साह देखने को मिल रहा है। शिव-शक्ति के 12 पवित्र स्थानों में से इससे पहले आपने सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारेश्वर, भीमाशंकर, विश्वेश्वर और त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में पढ़ा। आज सावन के तीसरे सोमवार के खास मौके पर हम आपको नवें ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ धाम के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।
झारखंड के देवघर जिले में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक अत्यंत पवित्र स्थल है। यहां भोलेनाथ की पूजा एक दिव्य चिकित्सक यानी ‘वैद्य’ के रूप में की जाती है। देवघर राज्य की राजधानी रांची से लगभग 243 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है और इसे झारखंड का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल माना जाता है।

जानिए कैसे हुई बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (Baidyanath Jyotirlinga) की स्थापना
Baidyanath Jyotirlinga की उत्पत्ति को लेकर दो बेहद प्रसिद्ध पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार, लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस स्थान पर अपने दस सिरों की बलि दी थी। उसकी इस अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने रावण के कटे हुए सिरों को जोड़कर उसके सभी घावों को ठीक कर दिया। घावों का इलाज करने के कारण ही भगवान शिव को ‘बैद्यनाथ’ यानी चिकित्सकों के स्वामी का नाम मिला।
दूसरी मान्यता यह है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और वह चाहता था कि महादेव लंका चलकर बस जाएं। शिवजी लंका जाने के लिए तैयार नहीं हुए, लेकिन उन्होंने रावण को एक शिवलिंग दिया। उन्होंने शर्त रखी कि अगर उसने रास्ते में इस शिवलिंग को कहीं भी जमीन पर रखा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा।
रावण जब शिवलिंग लेकर लंका की ओर बढ़ रहा था, तब सभी देवता चिंतित हो गए। देवताओं के अनुरोध पर जल के देवता वरुण देव ने रावण के पेट में प्रवेश किया, जिससे उसे तीव्र लघुशंका की इच्छा हुई। रावण ने वहां मौजूद एक चरवाहे (जो वास्तव में वेश बदलकर आए भगवान विष्णु थे) को शिवलिंग पकड़ाया और चला गया। विष्णुजी ने मौका मिलते ही शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। रावण ने लौटने पर जब शिवलिंग को उठाने की कोशिश की, तो वह उसे हिला भी न सका। हार मानकर उसने वहीं पूजा-अर्चना की। माना जाता है कि वही स्थान आज का देवघर है।

ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ भी
देवघर केवल एक ज्योतिर्लिंग ही नहीं, बल्कि एक पवित्र शक्तिपीठ भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ कुण्ड में आत्मदाह कर लिया था, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे थे। सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 52 टुकड़े कर दिए। कहा जाता है कि सती का हृदय इसी देवघर स्थान पर गिरा था, जिसके कारण यह स्थान ‘हार्द पीठ’ या शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।
मंदिर की अनूठी वास्तुकला और परिसर
बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर काफी विशाल है और यहां कुल 22 मंदिर स्थित हैं। मुख्य मंदिर सबसे बड़ा है, जिसकी ऊंचाई लगभग 72 फीट है। इसका शिखर पिरामिड के आकार का बना हुआ है, जिसके ऊपर सोने के तीन कलश स्थापित हैं। ये कलश गिद्धौर के राजा पूरन सिंह द्वारा भेंट किए गए थे। शिखर पर पंचशूल और आठ पंखुड़ियों वाला चंद्रकांत मणि भी स्थापित है।
वर्तमान मंदिर का ढांचा मध्यकालीन शैली का है, जिसमें समय-समय पर अलग-अलग राजाओं और प्रशासकों ने अपना योगदान दिया। आज मंदिर ट्रस्ट इस पूरे परिसर का प्रबंधन और तीर्थयात्रियों की सुविधाओं की देखभाल करता है। मुख्य मंदिर के आसपास पार्वती, गणेश, कालभैरव, हनुमान, काली और अन्नपूर्णा जैसी देव-शक्तियों को समर्पित 22 छोटे मंदिर बने हुए हैं। खास बात यह है कि मां पार्वती का मंदिर मुख्य शिव मंदिर से लाल पवित्र धागे (गठबंधन) से बंधा रहता है।

बासुकीनाथ के बिना अधूरी मानी जाती है यात्रा
देवघर में पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालुओं के लिए एक और परंपरा पूरी करना जरूरी माना जाता है। देवघर से करीब 43 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ मंदिर स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब तक कोई श्रद्धालु बासुकीनाथ जाकर भगवान शिव के दर्शन नहीं करता, तब तक उसकी बैद्यनाथ धाम की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है।
सावन का विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला
हिंदू कैलेंडर के सावन महीने में यहां लगने वाला ‘श्रावणी मेला’ इस क्षेत्र का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन होता है। इस दौरान भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लाखों श्रद्धालु बिहार के सुल्तानगंज पहुंचते हैं। वहां से उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल भरकर श्रद्धालु लगभग 108 किलोमीटर की दूरी नंगे पैर पैदल तय करके देवघर पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ पर जल चढ़ाते हैं। ‘बोल बम’ के जयकारों के साथ जल लेकर चलने वाले कांवड़ियों की यह यात्रा शिवभक्ति का एक अद्भुत दृश्य पेश करती है।







