G7 Summit 2026: फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन में 52वीं G7 समिट की शुरुआत हो चुकी है, जो 17 जून तक चलेगी। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के इस महामंच पर हिस्सा लेने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी और यूके के पीएम कीर स्टारमर जैसे बड़े नेता फ्रांस पहुंच चुके हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी स्लोवाकिया का अपना दौरा पूरा करके इस समिट में शामिल होने के लिए पहुंच रहे हैं। फ्रांस की सरजमीं पर कदम रखते ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच एक बेहद अहम द्विपक्षीय बैठक भी हुई, जिसमें मैक्रों ने हालिया अमेरिका-ईरान समझौते को विश्व शांति के लिए एक बड़ा कदम बताया। इस समिट में पीएम मोदी भी कई वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत करेंगे, जिसमें राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ होने वाली मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इस पूरी बैठक की अहमियत क्या है और भारत के लिए यह क्यों खास है।

PM Modi का 100वां विदेशी दौरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह फ्रांस और स्लोवाकिया का दौरा बेहद खास है। 12 साल पहले साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद से यह उनका 100वां विदेशी दौरा है। पीएमओ (PMO) की आधिकारिक वेबसाइट के आंकड़ों को देखें, तो अपने अब तक के 12 साल के कार्यकाल में पीएम मोदी ने दुनिया के करीब 78 देशों की यात्रा की है।
अगर उनके अब तक के सफर पर नजर डालें, तो प्रधानमंत्री के तौर पर उनका सबसे पहला विदेशी दौरा 15 से 16 जून 2014 को पड़ोसी देश भूटान का था। इसके बाद उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में कुल 49 विदेशी यात्राएं कीं, जबकि अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान वे 27 बार विदेशी दौरों पर गए। 13 जून से शुरू हुआ उनका यह मौजूदा फ्रांस-स्लोवाकिया का दौरा उनके तीसरे कार्यकाल का 24वां दौरा है। पीएम मोदी 13 जून से 6 दिनों के इस सफर पर हैं और 18 जून को वे पेरिस के रास्ते वापस भारत लौट आएंगे।

G7 क्या है, इसमें कौन-कौन से देश हैं?
सरल शब्दों में कहें तो G7 यानी ‘ग्रुप ऑफ सेवन’ दुनिया के ऐसे 7 सबसे विकसित और अमीर देशों का एक अनौपचारिक समूह है, जिन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन या ‘मॉडर्न इकोनॉमी’ वाला देश माना जाता है। इस ग्रुप में मुख्य रूप से अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी शामिल हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ (EU) भी इसकी सभी चर्चाओं में हिस्सा लेता है।
इस समूह का इतिहास भी काफी दिलचस्प है। इसकी शुरुआत साल 1975 में हुई थी, तब इसे G6 कहा जाता था क्योंकि इसमें केवल छह देश ही शामिल थे। इसके अगले ही साल यानी 1976 में जब कनाडा इस समूह का हिस्सा बना, तब इसका नाम बदलकर G7 कर दिया गया। आगे चलकर साल 1998 में इसमें रूस को भी शामिल किया गया और यह मंच G8 के नाम से जाना जाने लगा।
हालांकि, यह बदलाव ज्यादा लंबा नहीं चला। साल 2014 में जब रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया, तो बाकी सदस्य देशों ने नाराजगी जताते हुए रूस को इस ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद से यह समूह एक बार फिर अपने पुराने नाम यानी G7 के रूप में काम कर रहा है।

भारत G7 में गेस्ट नेशन, पीएम 7वीं बार शामिल होंगे
भारत हालांकि आधिकारिक तौर पर G7 का सदस्य देश नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हर साल इस बैठक में भारत की मौजूदगी बेहद अहम होती है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था और वैश्विक मंच पर भारत के मजबूत होते कद की वजह से इसे हर बार एक विशेष आमंत्रित देश यानी ‘गेस्ट नेशन’ के तौर पर बुलाया जाता है। भारत को लगातार मिलने वाला यह न्योता दिखाता है कि दुनिया के बड़े मुद्दों को सुलझाने में भारत की भागीदारी कितनी जरूरी हो चुकी है।
अगर इतिहास की बात करें, तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साल 2005 से 2013 के बीच पांच बार इस समिट (जो उस समय G8 थी) में हिस्सा लिया था। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहली बार साल 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज शहर में हुई G7 समिट में आमंत्रित किया गया था। इसके बाद साल 2020 में अमेरिकी मेजबानी वाली समिट कोरोना महामारी के कारण रद्द हो गई थी।
साल 2021 में ब्रिटेन की मेजबानी में हुए सम्मेलन में पीएम मोदी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वर्चुअली शामिल हुए थे। इसके बाद से वे लगातार 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान, 2024 में इटली और 2025 में कनाडा में आयोजित हुई बैठकों में हिस्सा ले चुके हैं और इस साल वे 7वीं बार इस समिट का हिस्सा बनने जा रहे हैं।
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G7 समिट क्या है, इस बार इसके एंजेडे की खास बात क्या है?
G7 समिट हर साल होने वाली एक ऐसी उच्च स्तरीय बैठक है, जिसमें दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक दिशा तय करने के लिए सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक मंच पर जुटते हैं। इस ग्रुप का कोई स्थायी मुख्यालय या दफ्तर नहीं होता। इसकी अध्यक्षता हर साल रोटेशन के आधार पर सभी 7 देशों को बारी-बारी से मिलती है। जो देश अध्यक्ष होता है, वही उस साल की समिट की मेजबानी करता है और पूरा एजेंडा तय करता है। इस बार यह जिम्मेदारी फ्रांस के पास है, इसलिए बैठक एवियन शहर में हो रही है।
इस साल के एजेंडे में कई ऐसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं, जो सीधे तौर पर पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं। इस बार की चर्चा में मुख्य रूप से वैश्विक भू-राजनीतिक संकट (जैसे यूक्रेन का युद्ध, ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव, गाजा और लेबनान के हालात, और समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य रूट की सुरक्षा) शामिल हैं।
इसके साथ ही, वैश्विक आर्थिक सहयोग को बेहतर करने, आर्थिक असंतुलन को दूर करने और सबसे जरूरी विषय यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सुरक्षित इस्तेमाल और इसके नियमन पर भी गंभीर बातचीत होगी। इसके अलावा, फ्रांस ने इस बार बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, कैंसर के खिलाफ वैश्विक रिसर्च को बढ़ावा देने और क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट) की सप्लाई चेन को मजबूत करने जैसे नए मुद्दों को भी एजेंडे में जोड़ा है।
G20 से कैसे अलग है G7
अक्सर लोग G7 और G20 को एक जैसा समझ लेते हैं, लेकिन इन दोनों में काफी बड़ा अंतर है। सबसे बुनियादी अंतर इनके स्वरूप और प्राथमिकताओं में है। G7 के पास कोई कानूनी शक्ति नहीं होती और इसके सदस्य मिलकर कोई अंतरराष्ट्रीय कानून पास नहीं कर सकते, यह केवल आपसी सहमति और साझा बयानों पर काम करता है। वहीं, प्राथमिकताओं की बात करें तो G20 का मुख्य फोकस हमेशा वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिरता पर होता है, जबकि G7 के मंच पर आर्थिक मसलों के साथ-साथ बड़े राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी उतनी ही तरजीह दी जाती है।
दूसरा बड़ा अंतर इसके सदस्यों की संख्या और उनके प्रभाव का है। साल 1999 में बने G20 ग्रुप का दायरा काफी बड़ा है। इसमें G7 के सभी सात देशों के अलावा भारत, चीन, रूस, ब्राजील, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसी दुनिया की उभरती और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं, जिन्हें ब्रिक्स (BRICS) और अन्य क्षेत्रीय संगठनों का नेतृत्व हासिल है। जानकारों का मानना है कि आज के दौर में G20 ज्यादा व्यावहारिक और प्रभावी गुट बनकर उभरा है, क्योंकि इसमें दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी और आर्थिक हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व होता है। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साल 2020 में G7 को एक पुराना और अप्रासंगिक (आउटडेटेड) समूह कह दिया था।
फ्रांस के एवियन में हो रही यह 52वीं G7 समिट ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया कई मोर्चों पर युद्ध और आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है। इस मंच पर भले ही दुनिया के सात सबसे अमीर देश बैठते हों, लेकिन भारत जैसे ‘गेस्ट नेशन’ की मौजूदगी के बिना वैश्विक समस्याओं का ठोस समाधान ढूंढना मुमकिन नहीं है।
पीएम मोदी का यह 100वां विदेशी दौरा न केवल उनके व्यक्तिगत कार्यकाल का एक बड़ा पड़ाव है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मजबूत होती कूटनीति और अनिवार्य उपस्थिति की कहानी भी बयां करता है। आने वाले दो दिनों में इस मंच से निकलने वाले फैसले और साझा बयान दुनिया की भावी राजनीति और अर्थव्यवस्था की नई रूपरेखा तय करेंगे।
