भागलपुर (बिहार): बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण की वोटिंग 11 नवंबर को होने जा रही है और इस बार सबकी निगाहें भागलपुर विधानसभा सीट पर टिकी हुई हैं। यह सीट राज्य की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित सीटों में से एक मानी जाती है, जहां इस बार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत शर्मा और बीजेपी के युवा चेहरा रोहित पांडे के बीच रोमांचक मुकाबला देखने को मिल रहा है। इस पारंपरिक दो-तरफा जंग में अब एक नया समीकरण जोड़ दिया है प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज के उम्मीदवार अभय कांत झा ने, जो दोनों दिग्गज दलों के लिए नई चुनौती साबित हो सकते हैं।
भागलपुर का चुनावी इतिहास हमेशा से दिलचस्प रहा है। यह एक सामान्य वर्ग की सीट है, जहां लंबे समय से कांग्रेस और बीजेपी का वर्चस्व रहा है। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में अजीत शर्मा ने 65,502 वोट (40.52%) हासिल कर जीत दर्ज की थी, जबकि रोहित पांडे को 64,389 वोट (39.83%) मिले थे — यानी जीत का अंतर सिर्फ 1,113 वोटों का रहा था। वहीं, 2015 में भी शर्मा ने बीजेपी के अरजीत शाश्वत चौबे को करीब 10,658 वोटों से हराया था। यह आंकड़े बताते हैं कि भागलपुर की जनता हर चुनाव में गंभीरता से वोट करती है और मामूली लहर भी नतीजा बदल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार लोजपा (LJP) का एनडीए में लौटना बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है। 2020 में एलजेपी ने अलग चुनाव लड़ा था और उसके उम्मीदवार को 20,000 से ज़्यादा वोट मिले थे, जिससे बीजेपी के वोट बैंक पर सीधा असर पड़ा था। वहीं अब एनडीए एकजुट है और रोहित पांडे को उम्मीद है कि इस बार “मोडी मैजिक” और “सुशासन” की अपील काम आएगी।
भागलपुर की सीट का इतिहास बताता है कि यहां कभी किसी तीसरे दल को जगह नहीं मिली। 1951 से अब तक हुए 18 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (या जनसंघ) ने नौ-नौ बार जीत दर्ज की है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जन सुराज पार्टी क्या इस पारंपरिक समीकरण को बदल पाती है या नहीं।
राजनीतिक रूप से भागलपुर एक शहरी और शिक्षित निर्वाचन क्षेत्र है, जिसकी साक्षरता दर बिहार के औसत से कहीं अधिक है। यह सीट भागलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, जहां के छह विधानसभा क्षेत्रों — बिहपुर, गोपालपुर, पीरपैंती (SC), कहलगांव, सुल्तानगंज और नाथनगर — में भी दूसरे चरण में वोट डाले जाएंगे। इन सभी सीटों पर एनडीए और महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-लेफ्ट) के बीच जोरदार मुकाबला है।
भागलपुर के लोग रोजगार और पलायन के मुद्दे को इस चुनाव में सबसे बड़ा एजेंडा मान रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि “सिल्क सिटी” के नाम से मशहूर यह इलाका आज भी टसर सिल्क उद्योग पर निर्भर है, लेकिन उत्पादन लागत बढ़ने और आधुनिक बाजार की कमी के कारण युवा पलायन कर रहे हैं। जनता चाहती है कि जो भी सरकार बने, वह स्थानीय उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ठोस काम करे।
इतिहास की बात करें तो इस सीट से बीजेपी नेता अश्विनी कुमार चौबे ने 1995 से 2014 तक लगातार पांच बार जीत हासिल की और बाद में सांसद एवं केंद्रीय मंत्री बने। उनके राष्ट्रीय राजनीति में जाने के बाद कांग्रेस के अजीत शर्मा ने 2014 का उपचुनाव जीतकर इस सीट को अपने नाम किया और 2015 तथा 2020 में भी इसे बरकरार रखा।
2024 के लोकसभा चुनावों में एनडीए ने इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया था, जिससे बीजेपी का आत्मविश्वास और बढ़ा है। वहीं, कांग्रेस को भरोसा है कि अजीत शर्मा की व्यक्तिगत छवि और जनता से जुड़ाव उन्हें फिर से जीत दिला सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 6 नवंबर को 65.08% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के इतिहास में सबसे ऊंचा है। दूसरे चरण में 122 सीटों पर मतदान होगा, जिसमें भागलपुर की अहम भूमिका रहेगी। इस बार न सिर्फ दलों की साख बल्कि गठबंधन की एकता और नई राजनीतिक सोच की परीक्षा भी होगी।
भागलपुर का यह चुनाव सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार की सियासी दिशा तय करने वाला निर्णायक मुकाबला है। जनता अब विकास और अवसरों की उम्मीद के साथ मतदान करने की तैयारी में है। 11 नवंबर को होने वाली वोटिंग और 14 नवंबर को आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि “सिल्क सिटी” किस राजनीतिक रंग में रंगेगा — लाल, भगवा या जन सुराज का नया नीला।
