अगर आपके घर में कोई बच्चा इस साल नौवीं क्लास में गया है, या आप खुद स्कूल की पढ़ाई से जुड़े हैं, तो सीबीएसई का यह नया अपडेट आपके लिए बेहद जरूरी है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने अपनी भाषा नीति में एक बड़ा बदलाव किया है, जो सीधे तौर पर कक्षा 9 के छात्रों को प्रभावित करने वाला है। आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि बोर्ड का यह नया फैसला क्या है और इससे छात्रों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ेगा।
1 जुलाई से लागू होगा नया थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला
CBSE द्वारा जारी किए गए एक नए सर्कुलर के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए अब तीन भाषाएं (Three Languages) पढ़ना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। यह नया नियम 1 जुलाई 2026 से सीबीएसई से मान्यता प्राप्त देश के सभी स्कूलों में लागू हो जाएगा। हालांकि, छात्रों के लिए राहत की बात यह है कि उन्हें कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में इस तीसरी भाषा का कोई अलग से पेपर नहीं देना होगा। यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के उस बुनियादी ढांचे को कानूनी रूप देने के लिए लिया गया है, जिसमें स्कूली शिक्षा में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात कही गई थी।
सत्र के बीच में बदलाव के लिए ‘ट्रांजिशनल अप्रोच’
चूंकि नया शैक्षणिक सत्र (2026-27) पहले ही अप्रैल के महीने से शुरू हो चुका है और यह गाइडलाइन बीच सत्र में आई है, इसलिए स्कूलों और छात्रों को अचानक परेशानी न हो, इसके लिए बोर्ड ने एक ‘ट्रांजिशनल अप्रोच’ यानी बदलाव के दौर वाली प्रणाली अपनाने का फैसला किया है। इसके तहत सीबीएसई अपनी अध्ययन योजना (Scheme of Studies) को एनसीईआरटी (NCERT) के वर्तमान पाठ्यक्रम के साथ धीरे-धीरे तालमेल में लाएगी, ताकि पढ़ाई का तरीका सुचारू रूप से बदल सके और बच्चों पर अचानक मानसिक दबाव न बढ़े।
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अब दो भारतीय भाषाएं पढ़ना हुआ अनिवार्य
इस नई नीति की सबसे खास बात यह है कि छात्रों को जो तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, उन्हें R1, R2 और R3 का नाम दिया गया है। बोर्ड ने साफ कर दिया है कि इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं मूल भारतीय (Native Indian Languages) होनी ही चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र अंग्रेजी पढ़ता है, तो उसे बाकी की दो भाषाएं हिंदी, संस्कृत, तमिल या कोई अन्य भारतीय भाषा ही चुननी होगी। जो छात्र विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच या जर्मन) पढ़ना चाहते हैं, वे इसे तीसरी भाषा के रूप में तभी ले सकते हैं जब उनकी बाकी दो भाषाएं भारतीय हों, या फिर वे इसे चौथे अतिरिक्त विषय के रूप में चुन सकते हैं।
CBSE का यह कदम बच्चों को अपनी संस्कृति और देश की विभिन्न भाषाओं से जोड़ने का एक अच्छा प्रयास है। हालांकि सत्र के बीच में इस नियम के आने से शुरुआत में स्कूलों को टाइम-टेबल और शिक्षकों के तालमेल में थोड़ी दिक्कत आ सकती है, लेकिन ‘ट्रांजिशनल अप्रोच’ के कारण छात्रों को ढलने का मौका मिल जाएगा। आने वाले समय में यह नीति भारतीय भाषाओं के संरक्षण और छात्रों के बहुभाषी विकास में मददगार साबित हो सकती है।


