दुनिया के नक्शे पर उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है जिसकी हर हलचल बाकी देशों को सतर्क कर देती है। हाल ही में इस देश ने अपनी सुरक्षा और परमाणु नीति को लेकर एक ऐसा फैसला किया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। North Korea ने अपने संविधान और परमाणु नियमों में एक बड़ा बदलाव किया है। इस नए प्रावधान के अनुसार, अगर देश के शीर्ष नेता किम जोंग-उन की हत्या हो जाती है या किसी बाहरी हमले की वजह से वे नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं रहते, तो देश की सेना बिना देरी किए तुरंत परमाणु हमला कर देगी। यह कदम दिखाता है कि प्योंगयांग अपनी लीडरशिप की सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है।

क्यों बदली गई उत्तर कोरिया की परमाणु नीति?
इस बड़े बदलाव के पीछे एक बड़ी वजह ईरान में हुई हालिया घटनाएं मानी जा रही हैं। एक ब्रिटिश अखबार की एक रिपोर्ट बताती है कि इस साल मार्च में तेहरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने उत्तर कोरिया को हिलाकर रख दिया। उस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारियों की मौत हो गई थी।
सियोल की खुफिया एजेंसी का मानना है कि इन सटीक हमलों को देखकर किम जोंग-उन को यह डर सताने लगा है कि भविष्य में उनके खिलाफ भी ऐसी ही ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ (शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने वाला हमला) हो सकती है। इसी खतरे को भांपते हुए 22 मार्च को प्योंगयांग में हुई सुप्रीम पीपुल्स असेंबली के दौरान इस नई नीति को आधिकारिक तौर पर संविधान का हिस्सा बना दिया गया। डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान में जो हुआ, वह उत्तर कोरिया के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ की तरह था।

North Korea में हमला करना मुश्किल
भले ही North Korea अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि वहां ईरान जैसा ऑपरेशन करना लगभग नामुमकिन है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला यह कि North Korea दुनिया का सबसे बंद देश है। वहां विदेशी नागरिकों, राजदूतों और यहां तक कि मदद पहुंचाने वाले कर्मचारियों पर भी 24 घंटे कड़ी नजर रखी जाती है। ऐसे में वहां से खुफिया जानकारी जुटाना किसी भी विदेशी एजेंसी के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।
ईरान में इजराइली एजेंसियों ने ट्रैफिक कैमरों और डिजिटल नेटवर्क को हैक करके नेताओं की लोकेशन का पता लगाया था, लेकिन प्योंगयांग में यह तकनीक काम नहीं करेगी। वहां न तो इंटरनेट सिस्टम पर बाहरी लोगों का कंट्रोल है और न ही सीसीटीवी का नेटवर्क इतना फैला हुआ है। इसके अलावा, किम जोंग-उन अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। वे हवाई यात्रा करने के बजाय अपनी खास बख्तरबंद ट्रेन से सफर करना पसंद करते हैं और उनके साथ हमेशा हथियारों से लैस बॉडीगार्ड्स का एक बड़ा घेरा होता है।
North Korea और कौन से सैन्य कदम उठा रहा है?
सिर्फ परमाणु नीति ही नहीं, North Korea जमीनी स्तर पर भी अपनी ताकत बढ़ा रहा है। किम जोंग-उन ने हाल ही में एक हथियार फैक्ट्री का दौरा किया और वहां नई ‘155 मिलीमीटर सेल्फ-प्रोपेल्ड गन-हाउइट्जर’ के उत्पादन का जायजा लिया। यह एक ऐसी तोप है जो 60 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक निशाना साध सकती है।
इस साल के अंत तक इसे दक्षिण कोरिया की सीमा के पास तैनात करने की योजना है। अगर ऐसा होता है, तो दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल सीधे तौर पर उत्तर कोरियाई तोपों की जद में आ जाएगी। किम जोंग-उन अब खुलकर दक्षिण कोरिया को अपना मुख्य दुश्मन बताने लगे हैं और उन्होंने अपने संविधान से दोनों देशों के एकीकरण की बात भी हटा दी है। तकनीकी रूप से ये दोनों देश 1950 के दशक से ही युद्ध की स्थिति में हैं क्योंकि उनके बीच कभी कोई औपचारिक शांति संधि नहीं हुई।
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North Korea के पास अमेरिका तक पहुंचने वाली मिसाइलें हैं
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि उत्तर कोरिया के पास अब ऐसी मिसाइलें हैं जो सीधे अमेरिका तक पहुंच सकती हैं। हालांकि सटीक आंकड़ा किसी के पास नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्योंगयांग के पास सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। इनमें ह्वासोंग-15, ह्वासोंग-17 और ह्वासोंग-18 जैसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) शामिल हैं।
इन मिसाइलों की मारक क्षमता 10,000 से 15,000 किलोमीटर तक बताई जाती है, जिसका मतलब है कि अमेरिका का बड़ा हिस्सा इनके दायरे में आता है। कुछ रिपोर्टों का तो यह भी दावा है कि North Korea के पास 50 से 100 के करीब ऐसे परमाणु हथियार हो सकते हैं जिन्हें मिसाइलों के जरिए लॉन्च किया जा सकता है।
North Korea द्वारा अपनी परमाणु नीति को संविधान में शामिल करना यह स्पष्ट करता है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। किम जोंग-उन का यह संदेश दुनिया के लिए एक चेतावनी है कि उनके नेतृत्व को चुनौती देना एक बड़े परमाणु युद्ध को न्यौता देना हो सकता है। यह स्थिति न केवल एशियाई क्षेत्र के लिए बल्कि पूरी दुनिया की शांति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। आने वाले समय में देखना होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश प्योंगयांग के इस नए रुख पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।