TVK की सरकार में 5 सीटों का पेंच: क्या विजय पार कर पाएंगे बहुमत का जादुई आंकड़ा?

Share This Article

तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त जबरदस्त हलचल मची हुई है। दशकों तक द्रविड़ पार्टियों के दबदबे वाले इस राज्य में पहली बार किसी नई ताकत ने इतनी बड़ी सेंध लगाई है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK ने चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। लेकिन जीत की इस खुशी के बीच सरकार बनाने की राह काफी पेचीदा नजर आ रही है। राजभवन से लेकर चेन्नई की गलियों तक बस एक ही सवाल है—क्या विजय मुख्यमंत्री पद की शपथ ले पाएंगे?

TVK

राजभवन का रुख और बहुमत का गणित

गुरुवार को राजभवन की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान ने राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला दिया। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने TVK के अध्यक्ष विजय को मुलाकात के लिए बुलाया, लेकिन उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। राज्यपाल का तर्क सीधा है: TVK के पास फिलहाल विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए जरूरी विधायकों का समर्थन मौजूद नहीं है।

तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 118 है। विजय की पार्टी ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव तो हासिल कर लिया, लेकिन वह बहुमत से 10 कदम दूर रह गई। यही वजह है कि राज्यपाल फिलहाल ‘रुको और देखो’ की नीति अपना रहे हैं, जिससे सियासी गलियारों में बहस छिड़ गई है।

TVK

कांग्रेस का साथ और बदलता समीकरण

पिछले एक दशक से चला आ रहा डीएमके और कांग्रेस का मजबूत गठबंधन अब टूट चुका है। चुनाव के बाद कांग्रेस ने एक बड़ा फैसला लेते हुए TVK को समर्थन देने का ऐलान किया है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। हालांकि, कांग्रेस के समर्थन के बावजूद विजय का आंकड़ा 113 (108 + 5) तक ही पहुँचता है, जो 118 के आंकड़े से अभी भी कम है।

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के भीतर एक धड़ा पहले से ही विजय के साथ जाने के पक्ष में था। अब जब डीएमके-कांग्रेस गठबंधन बहुमत के करीब नहीं पहुँच पाया, तो कांग्रेस ने TVK का हाथ थामना बेहतर समझा। लेकिन असली चुनौती उन बाकी 5 सीटों को जुटाने की है, जिनके बिना सरकार बनाना मुमकिन नहीं है।

TVK

छोटी पार्टियों का समर्थन और संभावनाएँ

सरकार बनाने के लिए विजय अब डीएमके गठबंधन की अन्य छोटी पार्टियों की ओर देख रहे हैं। चर्चा है कि दो-दो सीटें जीतने वाली सीपीआई और सीपीआई(एम) TVK को समर्थन देने के संकेत दे रही हैं। इसके अलावा, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के पास भी 2 सीटें हैं। अगर ये पार्टियाँ साथ आती हैं, तो यह गठबंधन 119 के आंकड़े तक पहुँच सकता है।

अगर यह गणित बैठ जाता है, तो TVK के नेतृत्व वाली सरकार का रास्ता साफ हो सकता है। विजय ने बुधवार को राज्यपाल से मुलाकात कर अपना दावा पेश किया था, लेकिन राज्यपाल ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल दावों पर नहीं, बल्कि पुख्ता समर्थन पत्र के आधार पर ही कोई फैसला लेंगे।

TVK

एआईएडीएमके के भीतर की खींचतान

तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त एआईएडीएमके की भूमिका भी काफी अहम हो गई है। पार्टी के विधायकों को पुडुचेरी के एक रिजॉर्ट में ठहराया गया है, जिसे आमतौर पर ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहा जाता है। खबरें हैं कि पार्टी के भीतर दो गुट बन गए हैं—एक गुट TVK को समर्थन देने के पक्ष में है, जबकि दूसरा इसके सख्त खिलाफ।

हालांकि, एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेता केपी मुनुस्वामी ने इन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी महासचिव ईके पलानीस्वामी के नेतृत्व में हुई बैठक में ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है और TVK को समर्थन देने की बात महज एक अफवाह है।

TVK

त्रिशंकु विधानसभा और राज्यपाल की शक्तियाँ

जब किसी चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो उसे ‘हंग असेंबली’ या त्रिशंकु विधानसभा कहा जाता है। ऐसे में राज्यपाल के पास विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्यपाल को TVK को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए और उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौका देना चाहिए। इसे ‘अल्पमत सरकार’ का विकल्प कहा जाता है।

दूसरी ओर, यह भी चर्चा चल रही है कि क्या पुरानी प्रतिद्वंद्वी पार्टियाँ डीएमके और एआईएडीएमके मिलकर कोई नया समीकरण बना सकती हैं? हालांकि इसकी संभावना कम है, लेकिन राजनीति में कुछ भी नामुमकिन नहीं होता।

तमिलनाडु इस समय एक बड़े सियासी बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। TVK के लिए यह समय अपनी सांगठनिक शक्ति और राजनीतिक सूझबूझ दिखाने का है। क्या विजय बाकी छोटी पार्टियों को अपने साथ लाने में सफल होंगे या राज्य को फिर से चुनाव या किसी नए गठबंधन की ओर देखना होगा? फिलहाल सबकी नजरें राजभवन पर टिकी हैं। अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि तमिलनाडु की सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी। एक बात तो तय है कि इस चुनाव ने राज्य की पुरानी राजनीतिक परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है।

यह भी पढ़ें: West Bengal के राज्यपाल ने जारी किया आधिकारिक आदेश, ममता बनर्जी नहीं रहीं मुख्यमंत्री

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Channel

Advertisement

[wonderplugin_slider id=1]

Live Poll

आपके क्षेत्र में सबसे मजबूत दल कौन है?
  • Add your answer

Also Read This