अमेरिका-ईरान के बीच Ceasefire पर बनी सहमति: क्या पश्चिम एशिया में थमेगा बारूद का शोर?

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पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से जारी भारी तनाव के बीच आखिरकार एक ऐसी खबर आई है, जिसने न केवल खाड़ी देशों बल्कि पूरी दुनिया को राहत की सांस लेने का मौका दिया है। अमेरिका और ईरान, जो युद्ध के मुहाने पर खड़े थे, अब दो हफ्ते के ceasefire यानी युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। इस समझौते का सबसे बड़ा असर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर पड़ेगा, जिसे खोलने के लिए ईरान राजी हो गया है।

यह ceasefire ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं और तीसरे विश्व युद्ध जैसी आशंकाएं जताई जा रही थीं। चलिए विस्तार से समझते हैं कि इस समझौते के पीछे की कहानी क्या है और आगे क्या होने वाला है।

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राष्ट्रपति ट्रंप की बड़ी घोषणा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ceasefire की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान के साथ मिलकर तुरंत प्रभाव से हमलों को रोकने का फैसला किया है। ट्रंप, जो अब तक ईरान के प्रति बेहद कड़ा रुख अपनाए हुए थे, उनके इस फैसले ने राजनीतिक जानकारों को भी चौंका दिया है। इस ceasefire के लागू होते ही अमेरिकी और इजरायली मिसाइल हमलों पर अस्थायी रूप से रोक लग गई है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनका देश इस ceasefire की शर्तों का पालन करेगा। ईरान ने भरोसा दिलाया है कि इस अवधि के दौरान वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से अंतरराष्ट्रीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता देगा।

पाकिस्तान की मध्यस्थता और इस्लामाबाद वार्ता

इस पूरे कूटनीतिक खेल में पाकिस्तान की भूमिका एक बड़े सरप्राइज के रूप में उभरी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बताया कि यह केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा। शरीफ के अनुसार, इस शांति प्रक्रिया का दायरा लेबनान और उन सभी क्षेत्रों तक फैला होगा जहां ईरान समर्थित गुट और अमेरिकी सेना आमने-सामने हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ceasefire को स्थायी शांति में बदलने के लिए 10 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक बड़ी बैठक होने जा रही है। इस ‘इस्लामाबाद वार्ता’ में दोनों देशों के शीर्ष स्तर के अधिकारी और राजनयिक आमने-सामने बैठकर विवादित मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करेंगे। दुनिया भर की नजरें अब इस बैठक पर टिकी हैं, क्योंकि यहीं से तय होगा कि दो हफ्ते का यह ceasefire स्थायी शांति में बदलेगा या नहीं।

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‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का आर्थिक महत्व

आखिर अमेरिका और ईरान इस ceasefire के लिए क्यों तैयार हुए? इसका एक बड़ा जवाब ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में छिपा है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलएनजी (LNG) इसी रास्ते से गुजरती है। ईरान ने इस रास्ते पर अपना नियंत्रण कड़ा कर दिया था, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक दबाव और तेल की बढ़ती कीमतों ने ही अमेरिका को इस ceasefire की मेज पर आने के लिए मजबूर किया। जैसे ही इस समझौते की खबर दुनिया में फैली, तेल की कीमतों में 17 प्रतिशत से ज्यादा की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देशों के शेयर बाजारों में भी तेजी देखी गई है।

जमीन पर अब भी बरकरार है खतरा

कागजों पर भले ही ceasefire हो गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी काफी नाजुक है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और बहरीन जैसे देशों ने अब भी अपने एयर डिफेंस सिस्टम को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा है। इजरायल और ईरान के बीच भी छिटपुट हमलों की खबरें पूरी तरह थमी नहीं हैं।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या दोनों देशों के कमांडर्स और उनके समर्थक गुट (जैसे हिजबुल्ला या हुती विद्रोही) जमीनी स्तर पर संयम बरतेंगे? अगर एक भी चूक हुई, तो दो हफ्ते का यह ceasefire चंद घंटों में टूट सकता है। इजरायल ने भी साफ कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

आगे की राह और बड़ी चुनौतियां

भले ही हम आज एक ceasefire की बात कर रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान के रास्ते में कई कांटे हैं। ईरान ने अपनी कुछ सख्त शर्तें रखी हैं, जिनमें उसके ऊपर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, विदेशी बैंकों में फंसे ईरानी फंड को रिलीज करना और क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी शामिल है। वहीं, अमेरिका और इजरायल का मुख्य मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है, जिसे वे पूरी तरह बंद कराना चाहते हैं।

इस्लामाबाद की बातचीत में इन मुद्दों पर सहमति बनना आसान नहीं होगा। लेकिन फिलहाल के लिए, यह एक मरहम की तरह काम कर रहा है। मिस्र, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे देशों ने इस पहल का स्वागत किया है और कहा है कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है।

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह ceasefire दुनिया के लिए एक बड़ी राहत है। भले ही यह केवल 14 दिनों के लिए है, लेकिन इसने कूटनीति और बातचीत के लिए बंद हो चुके दरवाजों को फिर से खोल दिया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘होर्मुज स्ट्रेट’ का खुलना एक संजीवनी की तरह है। अब पूरी दुनिया की उम्मीदें 10 अप्रैल की इस्लामाबाद वार्ता पर टिकी हैं।

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