UP Police New Rule: अब 31 तरह के अपराधों में नहीं होगी सीधी FIR, बदल गया यूपी में केस दर्ज करने का तरीका

UP Police New Rule

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UP Police New Rule: उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर योगी सरकार ने एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव किया है। उत्तर प्रदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, अब 31 विशिष्ट श्रेणियों के मामलों में पुलिस सीधे एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं कर सकेगी। यह आदेश डीजीपी द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों और नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है।

इस बदलाव का सीधा मतलब यह है कि अब इन 31 तरह के अपराधों में शिकायत लेकर थाने जाने पर पुलिस तुरंत मुकदमा नहीं लिखेगी, बल्कि आपको कोर्ट या संबंधित मजिस्ट्रेट के पास जाने की सलाह देगी। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह नियम क्या है और इससे आम आदमी की जिंदगी पर क्या असर पड़ने वाला है।

UP Police का नया सर्कुलर: क्या है पूरा मामला? 

उत्तर प्रदेश के डीजीपी द्वारा जारी ताजा सर्कुलर ने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। नए नियमों के मुताबिक, अब पुलिस उन मामलों में सीधे हाथ नहीं डालेगी जो ‘शिकायत-आधारित संज्ञान’ (Complaint-based cognizance) के दायरे में आते हैं। दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कई बार इस बात पर नाराजगी जताई थी कि पुलिस उन मामलों में भी एफआईआर दर्ज कर लेती है, जहां कानूनन अधिकार केवल मजिस्ट्रेट के पास होता है। इससे न केवल पुलिस का समय बर्बाद होता था, बल्कि बाद में कोर्ट में ये केस तकनीकी आधार पर खारिज हो जाते थे। अब पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट कर दिया है कि किन 31 मामलों में पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय शिकायतकर्ता को सही कानूनी रास्ता दिखाना होगा।

इन 31 श्रेणियों में अब नहीं होगी सीधी कार्रवाई

प्रशासन ने उन कानूनों की एक लंबी लिस्ट तैयार की है जिनमें अब थाने के बजाय कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित मामले शामिल हैं:

  • चेक बाउंस (NI Act): अब चेक बाउंस होने पर सीधे थाने में एफआईआर नहीं होगी, आपको मजिस्ट्रेट के पास शिकायत फाइल करनी होगी

  • घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न: पारिवारिक विवादों में अक्सर गलत एफआईआर की शिकायतें आती थीं, अब इनमें भी मजिस्ट्रेट की भूमिका अहम होगी।

  • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH Act): इन मामलों में आंतरिक समिति या मजिस्ट्रेट के जरिए ही कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

  • उपभोक्ता और खाद्य सुरक्षा: मिलावट या ग्राहकों से धोखाधड़ी के मामलों में अब एफएसएसएआई (FSSAI) या कंज्यूमर फोरम की रिपोर्ट के बिना सीधी एफआईआर नहीं होगी।

  • पर्यावरण और पशु क्रूरता: हवा, पानी के प्रदूषण या जानवरों के साथ क्रूरता से जुड़े कानूनों में भी अब सीधे मुकदमे पर लगाम लगाई गई है।

क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत?

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा तर्क ‘कानून के दुरुपयोग’ को रोकना है। अक्सर देखा गया है कि आपसी रंजिश या छोटे-मोटे विवादों में लोग एक-दूसरे पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करा देते थे। इससे निर्दोष लोग पुलिसिया कार्रवाई के चक्कर में फंस जाते थे और अदालतों पर बोझ बढ़ता था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी माना कि जो मामले न्यायिक प्रकृति के हैं, उन्हें पुलिस के बजाय सीधे मजिस्ट्रेट द्वारा ही देखा जाना चाहिए। नए आपराधिक कानून BNSS में भी मजिस्ट्रेट को अधिक शक्ति दी गई है कि वे किसी भी जांच का आदेश देने से पहले खुद उसकी प्राथमिक जांच कर सकें। इससे जांच की गुणवत्ता में सुधार होगा और केवल सच्चे मामले ही कोर्ट तक पहुंचेंगे।

आम जनता के लिए अब क्या है विकल्प?

अगर आप इनमें से किसी श्रेणी की शिकायत लेकर थाने जाते हैं और पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं करती, तो घबराएं नहीं। पुलिस का काम अब आपको मना करना नहीं, बल्कि ‘गाइड’ करना होगा। आपको बताया जाएगा कि आपकी शिकायत किस मजिस्ट्रेट या अधिकृत अधिकारी के पास दर्ज होगी। अब आपको सीधे संबंधित कोर्ट में एक ‘प्रार्थना पत्र’ देना होगा। मजिस्ट्रेट आपकी शिकायत को सुनने के बाद अगर जरूरी समझेंगे, तो पुलिस को जांच के आदेश दे सकते हैं या खुद उस पर संज्ञान ले सकते हैं। इससे प्रक्रिया थोड़ी लंबी जरूर लग सकती है, लेकिन यह अधिक पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत होगी।

गंभीर अपराधों पर नहीं पड़ेगा असर

यहाँ यह समझना बहुत जरूरी है कि यह नियम केवल उन 31 श्रेणियों के लिए है जो अर्ध-न्यायिक प्रकृति की हैं। हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार, चोरी और पॉक्सो (POCSO) जैसे गंभीर अपराधों में एफआईआर दर्ज करने के नियम पहले की तरह ही रहेंगे। पुलिस इन गंभीर मामलों में बिना किसी देरी के तुरंत मुकदमा दर्ज करेगी। यह नया बदलाव केवल उन क्षेत्रों में है जहां पुलिस की शक्तियों और अदालती प्रक्रिया के बीच अक्सर टकराव होता था।

यूपी पुलिस का यह नया कदम कानूनी व्यवस्था को सुधारने की दिशा में एक बड़ा फैसला माना जा रहा है। 31 विशिष्ट श्रेणियों में सीधी एफआईआर बंद होने से पुलिस का ध्यान गंभीर अपराधों की जांच पर केंद्रित हो सकेगा और बेगुनाह लोगों को झूठे मुकदमों से बचाया जा सकेगा। हालांकि, शुरुआती दिनों में आम जनता के लिए कोर्ट के चक्कर काटना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह न्यायिक पारदर्शिता के लिए अच्छा साबित होगा। अगर आप भी किसी कानूनी उलझन में हैं, तो पहले यह जरूर चेक कर लें कि आपकी शिकायत इन 31 श्रेणियों में तो नहीं आती। जागरूक रहें और सही कानूनी रास्ता चुनें।

यह भी पढ़ें: जनगणना 2027 का पहला चरण शुरू: डिजिटल तरीके से पहली बार होगी पूरी प्रक्रिया

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