उन्नाव जिले में 150 सालों से चली आ रही परंपरा अब भी उतनी ही जीवंत है। स्वदेशी मेला इस बार भी विजय दशमी के पांचवे दिन पूर्णमासी से शुरू हो गया। लगभग एक महीने तक चलने वाले इस मेले का आकर्षण अब भी पहले जैसा ही है।
बड़ा चौराहा से रामलीला मैदान तक एक किलोमीटर लंबी सड़क दोनों ओर दुकानों से सज जाती है। छोटे-बड़े सभी प्रकार के दुकानदार यहां अपने देशी उत्पाद लेकर आते हैं। कांच के बर्तन, चूड़ियां, कपड़े, लकड़ी और सजावटी सामान, प्लास्टिक के खिलौने, खाना बनाने के बर्तन — सब कुछ बहुत कम कीमत में मिलता है।
स्थानीय लोगों और दुकानदारों का कहना है कि स्वदेशी सामान खरीदना सिर्फ रोजमर्रा की जरूरत पूरी करना नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है। पैसा देश में रहेगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा और स्थानीय कारीगरों की मेहनत को सम्मान मिलेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा चलाए जा रहे “स्वदेशी अपनाओ” अभियान का असर इस मेले पर साफ दिखाई दे रहा है। लोग अब पहले से ज्यादा उत्साहित हैं। मेले में भीड़ सुबह से शाम तक लगी रहती है, और दुकानदारों के चेहरे पर संतोष और उम्मीद दोनों नजर आते हैं।
अरशद, जो इस मेले में छोटी दुकान चलाते हैं, कहते हैं:
“यह मेला हमारे लिए सिर्फ बिक्री का मौका नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति और देशी उत्पादन को लोगों तक पहुँचाने का भी अवसर है। लोग स्वदेशी सामान खरीदकर हमारी मेहनत और देश की अर्थव्यवस्था दोनों में मदद कर रहे हैं।”
मेला सिर्फ खरीदारी का स्थल नहीं है, बल्कि यहाँ लोक संस्कृति, परंपरागत खेल और मनोरंजन का भी मंच सजता है। बच्चे खेलते हैं, बुजुर्ग पुराने समय की यादों को ताजा करते हैं, और युवा पीढ़ी भारतीय उत्पादों के प्रति जागरूक होती है।
इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि सभी उत्पाद देश में बने हुए हैं। किसी भी विदेशी सामान का दबदबा यहाँ नहीं है। यही वजह है कि इसे 150 साल से लोग दिल से पसंद कर रहे हैं।
मेले में स्थानीय कारीगरों की मेहनत, पारंपरिक कला और देशी उत्पादों की विविधता एक साथ देखने को मिलती है। हर साल की तरह इस साल भी लोग दूर-दूर से मेले देखने और खरीदारी करने आते हैं।
स्थानीय प्रशासन ने भी सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। पुलिस और यातायात कर्मियों की टीम पूरे मेला क्षेत्र में तैनात है ताकि मेले का माहौल सुरक्षित और शांतिपूर्ण बना रहे।
यह मेला न सिर्फ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है, बल्कि देशभक्ति और स्वदेशी प्रेम को भी बढ़ावा देता है। ऐसे में हर कोई चाहता है कि यह परंपरा लगातार बनी रहे और नई पीढ़ी तक पहुँचे।







