पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है। कभी जिस राज्य में भाजपा की सरकार की कल्पना करना भी मुश्किल था, आज वहां भगवा दल ने अपना परचम लहरा दिया है। शनिवार को कोलकाता का ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान एक ऐतिहासिक गवाह बना, जहां Suvendu Adhikari ने राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पार्टी के सबसे पुराने कार्यकर्ताओं तक की मौजूदगी ने माहौल को और भी खास बना दिया।

ममता बनर्जी के करीबी से उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी तक
Suvendu Adhikari का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 57 साल के अधिकारी कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सिपाहियों में गिने जाते थे। उन्होंने 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ‘दीदी’ को हराकर देशभर में सुर्खियां बटोरी थीं। इस बार उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ते हुए ममता बनर्जी को उनके ही सबसे मजबूत गढ़ भवानीपुर से शिकस्त दी और साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति में अब हवा बदल चुकी है।

जमीनी स्तर से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
शुभेंदु का जन्म शिशिर कुमार अधिकारी के घर हुआ और उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआती पढ़ाई कांग्रेस के साथ की। Suvendu Adhikari ने महज 31 साल की उम्र में अपना पहला चुनाव जीता था, जब वह कोंटाई नगर परिषद के पार्षद बने। इसके बाद वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और 2006 में पहली बार विधायक चुने गए। उनके पास संगठन चलाने की गजब की समझ है और ममता सरकार में मंत्री रहने की वजह से प्रशासन चलाने का भी लंबा अनुभव है।

नंदीग्राम आंदोलन और टीएमसी में बढ़ता कद
अगर आज ममता बनर्जी को बंगाल में जाना जाता है, तो उसमें 2007 के नंदीग्राम आंदोलन की बड़ी भूमिका है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उस आंदोलन को जमीन पर उतारने वाले असली खिलाड़ी Suvendu Adhikari ही थे। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए उस संघर्ष ने उन्हें पार्टी में बहुत ऊंचा स्थान दिलाया। इसके बाद वे सांसद भी बने और 2016 में मंत्री के तौर पर बंगाल की सेवा की। हालांकि, 2020 में कुछ वैचारिक मतभेदों की वजह से उन्होंने टीएमसी का साथ छोड़ दिया और भाजपा का दामन थाम लिया।

साधारण जीवन और सेवा का संकल्प
राजनीति के इस बड़े चेहरे का निजी जीवन काफी सादा है। Suvendu Adhikari ने अपना पूरा जीवन जनसेवा के लिए समर्पित कर दिया है और वे अविवाहित हैं। रबिंद्र भारती यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री लेने वाले शुभेंदु पेशे से एक व्यवसायी भी हैं। हलफनामे के मुताबिक, उनके पास अपनी कोई गाड़ी भी नहीं है, जो उनकी सादगी को दर्शाता है। अब मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने बंगाल के विकास और कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है।

भाजपा के लिए ऐतिहासिक जीत
यह जीत भाजपा के लिए केवल एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि एक विचारधारा की जीत है। Suvendu Adhikari ने जिस तरह से ममता बनर्जी के खिलाफ खुद को एक विकल्प के रूप में पेश किया, उसी का नतीजा है कि आज बंगाल में भाजपा की सरकार बन पाई है। शपथ ग्रहण के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अधिकारी अपनी कैबिनेट में किन चेहरों को शामिल करते हैं और बंगाल के लिए उनका पहला बड़ा फैसला क्या होगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा का सपना सच करने वाले Suvendu Adhikari अब राज्य की कमान संभाल चुके हैं। एक अनुभवी नेता और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व होने के नाते, बंगाल की जनता को उनसे काफी उम्मीदें हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे ‘सोनार बांग्ला’ के वादे को कैसे पूरा करते हैं।
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