उत्तर प्रदेश के Sambhal से न्याय और पुनर्वास की एक बड़ी खबर सामने आई है। साल 1978 में हुए दंगों के दौरान अपना सब कुछ गंवाकर दिल्ली पलायन कर चुके एक पीड़ित Rastogi परिवार को आखिरकार अब जाकर अपनी जमीन वापस मिलने जा रही है। प्रशासन इस विस्थापित परिवार को पुनर्वास के तौर पर 100 गज जमीन का पट्टा सौंपने जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि यह जमीन उसी तीन बीघा सरकारी भूमि का हिस्सा है, जिसे कुछ समय पहले अतिक्रमण मुक्त कराया गया था।

कहाँ और किसे मिल रही है जमीन?
Sambhal कोतवाली क्षेत्र के आलम सराय देहात गांव में स्थित इस सरकारी जमीन पर 1978 के दंगे में मारे गए रामशरण Rastogi के परिवार को बसाया जाएगा। मुरादाबाद कमिश्नर आंजनेय कुमार सिंह, डीएम अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई इस पट्टे का प्रमाण पत्र बुधवार को परिवार को सौंपेंगे। हालांकि, यह कार्यक्रम पहले मंगलवार को होना था, लेकिन कुछ प्रशासनिक वजहों से इसे एक दिन के लिए आगे बढ़ा दिया गया। कार्यक्रम स्थल पर जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं और संभल नगर पालिका की टीम सफाई व्यवस्था में जुटी है।

अतिक्रमण मुक्त भूमि पर हो रहा पुनर्वास
जिस जमीन पर Rastogi परिवार को पट्टा दिया जा रहा है, वह करीब तीन बीघा सरकारी भूमि है। इस जमीन पर पहले ‘टीले वाली मस्जिद’ के नाम पर अतिक्रमण करके कब्रिस्तान बना लिया गया था। तहसीलदार कोर्ट के आदेश के बाद पिछले साल 12 अगस्त 2025 को पुलिस और प्रशासन की टीम ने भारी सुरक्षा के बीच इस पूरी जमीन को भू-माफियाओं और अवैध कब्जे से मुक्त कराया था। अब इसी जमीन का इस्तेमाल दंगा पीड़ितों की मदद के लिए किया जा रहा है।
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1978 के उस काले दिन की कहानी
मृतक रामशरण Rastogi के पोते कपिल रस्तोगी ने उस दौर का दर्द बयां करते हुए बताया कि 29 मार्च 1978 को संभल में भयानक दंगा भड़का था। उनके दादा की परचून की दुकान पुलिस चौकी से महज 50 मीटर दूर थी। इसके बावजूद दंगाइयों की भीड़ ने उनके दादा को दुकान से खींचकर बेरहमी से मार डाला। दुकान लूटने के बाद आग लगा दी गई और उनके शव को तराजू-बांट से बांधकर पास के एक कुएं में फेंक दिया गया। तीन दिन बाद जब शव मिला, तो उस पर कुल्हाड़ी और चाकू के गहरे निशान थे। इस घटना के बाद डर के मारे पूरा परिवार दिल्ली चला गया था।
पीड़ित परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि जिस कुएं में उनके दादा का शव मिला था, वहां उनकी एक प्रतिमा लगाई जाए और उस चौराहे का नाम ‘स्व. रामशरण दास चौराहा’ रखा जाए।
देर से ही सही, लेकिन संभल प्रशासन का यह कदम सराहनीय है। इतने दशकों बाद पीड़ित परिवार को उनकी जड़ों से दोबारा जोड़ना और पुनर्वास की व्यवस्था करना यह दिखाता है कि कानून के राज में देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं।
