हर किसी को हमने……!

हर किसी को हमने

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दुनिया भर के लोगों ने,
दिन के उजाले में….
उसका मुस्कुराता मुखड़ा देखा…
किसी ने क्या समझा…क्या पाया…
मालूम नहीं मुझको….पर हाँ…!
मैंने तो अक्सर ही….बंद कमरे में….
उसको खामोश रोते देखा…..
ताउम्र तन्हाई में ही काटी जिंदगी
मानो या ना मानो….सच है कि…..
उसने तो यहाँ….न कोई शिकवा…
न कोई गिला देखा….
साथ उसके नहीं था कभी कोई भी..
यहाँ तक कि….परछाई भी…!
जब कभी साथ आई…
उससे भी खुद को उसने छला देखा….
लेकिन ज़माने में…बड़ी मजबूती से…
संभाले रखा खुद को…संग इसके…
इरादे भी बुलंद रखा उसने….
जानता था वह….पूरी दुनियादारी…
फिर भी….सारी दुनिया को उसने…
ख़ुद की नजरों में….भला देखा…
उम्मीद थी…कोई तो मरहम लगाएगा….!
तमाम जख्मों पर उसके….
सोचता रहा हरदम यही….पर….
मतलबी दुनिया में उसने…..!
ज़ख्म पर नमक छिड़कने का….
दर्द भरा सिलसिला देखा…..
होंठ तक भी उसके थे सिले हुए….
आँख दोनों कभी….सूखी ही नहीं….
पर…लोगों ने जब भी देखा…
चेहरा उसका खिला-खिला देखा….
दर्जनों दीवारें खड़ी रही चक्रव्यूह सी
सामने सिसकियाँ भी हज़ार थी…
पर….व्यूह रचना तोड़ने को…
हमने तो उसको अकेले खड़ा देखा..
वार पर वार सहा चारों ओर से उसने,
ढाल कोई-कहाँ मिली कभी उसको
फिर भी….फौलाद बनकर…
हमेशा उसको अड़ा देखा….
रही खूबियाँ ही खूबियाँ उसमें प्यारे,
निभाई भी सारी जिम्मेदारियाँ उसने
पर मतलबी दुनिया वालों ने….
कहाँ कभी उसको बड़ा देखा….?
बेवफाई….यहाँ तक देखी प्यारे….
कि ख़ुद की सजाई महफिलों में भी
हमने उसको….मौन मूरत सा…
किसी कोने में पड़ा देखा…
अचरज़ मत मानो मित्रों….!
सारी जिंदगी लोगों ने….जिसको…
कूड़ा-कबाड़ और सड़ा-सड़ा देखा..
मौत के बाद सबने पहचाना उसको
और…अंगूठी में हीरे सा जड़ा देखा..
यही दुनिया है….और…
यही दुनिया की रीति है प्यारे…!
यहाँ किताबों से दूर जाकर….
हर किसी को हमने…..
ख़ुद की पढ़ाई….पढ़ा देखा….!
हर किसी को हमने…..
ख़ुद की पढ़ाई….पढ़ा देखा….!

लेख: जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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