Lucknow Dussehra : लखनऊ में इस बार दशहरे का नजारा कुछ अलग होने वाला है। ऐशबाग रामलीला मैदान में रावण का ऐसा हाईटेक पुतला देखने को मिलेगा, जो खुद चलकर मैदान में आएगा और तलवार भी लहराएगा। उसके हाथ-पैर भी हिलेंगे। यानी इस बार रावण दहन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि तकनीक और मनोरंजन का खास मेल बनने जा रहा है। खास बात यह है कि रामलीला में AI का इस्तेमाल भी किया जा रहा है, जिससे नई पीढ़ी यानी Gen-Z को इस आयोजन से जोड़ने की कोशिश होगी।
हाईटेक रावण बनेगा दशहरे का खास आकर्षण
ऐशबाग रामलीला मैदान में इस बार रावण का पुतला आधुनिक तकनीक के साथ तैयार किया जा रहा है। आयोजन से जुड़े लोगों के मुताबिक, पुतला खुद चलकर मैदान में आएगा और तलवार लहराते हुए दर्शकों का ध्यान खींचेगा। उसके हाथ-पैर भी हिलेंगे, जिससे पूरा दृश्य पहले से ज्यादा रोमांचक लगेगा। रावण दहन के बाद करीब 45 मिनट तक आतिशबाजी का आयोजन भी होगा। ऐसे में बच्चों से लेकर युवाओं तक के लिए यह कार्यक्रम खास आकर्षण बन सकता है।
AI और डिजिटल तकनीक से बदलेगा रामलीला का अंदाज
इस बार ऐशबाग रामलीला में सिर्फ रावण का पुतला ही आधुनिक नहीं होगा, बल्कि मंचन में भी नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। रामायण के कई प्रसंग AI की मदद से दिखाए जाएंगे। वहीं, राम बारात में डिजिटल हाथी भी नजर आएगा। इन बदलावों का मकसद रामलीला को आज की पीढ़ी के लिए और दिलचस्प बनाना है। तकनीक के जरिए पुराने प्रसंगों को नए अंदाज में पेश किया जाएगा, ताकि दर्शक कहानी से बेहतर तरीके से जुड़ सकें।
500 साल पुरानी बताई जाती है ऐशबाग रामलीला
ऐशबाग रामलीला कमेटी का दावा है कि इस आयोजन की शुरुआत करीब 500 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। कमेटी के अध्यक्ष हरिश्चंद्र के अनुसार, 16वीं शताब्दी में तुलसीदास लखनऊ आए थे। करीब चार महीने के प्रवास के दौरान उन्होंने ऐशबाग में रामलीला मंचन शुरू किया। समय के साथ यह परंपरा लखनऊ से निकलकर प्रदेश के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंची। लंबे समय तक अयोध्या के साधु-संत भी इस आयोजन से जुड़े रहे और रामलीला मंचन में हिस्सा लेते रहे।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है यह आयोजन
ऐशबाग रामलीला की खासियत सिर्फ इसकी धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आपसी भाईचारा भी है। कमेटी अध्यक्ष के मुताबिक, नवाब आसफुद्दौला ने ईदगाह और रामलीला के लिए छह-छह एकड़ जमीन दी थी। रामलीला मैदान के सामने ही ऐशबाग ईदगाह स्थित है। जहां ईद और बकरीद पर मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं, वहीं दशहरे के दौरान बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने भी पहुंचते हैं। दोनों समुदायों के बीच सहयोग को लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत मिसाल माना जाता है। समय के साथ ऐशबाग रामलीला मैदान का स्वरूप भी बदला है। पहले यहां बीच में गहरा मंच और चारों ओर सीढ़ीनुमा बैठने की व्यवस्था थी। अब मैदान को आधुनिक रूप दिया गया है।
आयोजन में सफाई, लाइट, साउंड, फॉगिंग और पानी जैसी व्यवस्थाओं में प्रशासन सहयोग करता है। नगर दर्शन और शोभायात्रा के आयोजन में भी जिला प्रशासन और संस्कृति विभाग की भूमिका रहती है।
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