Sawan का पवित्र महीना शुरू होते ही Kashi की गलियां शिवभक्ति के रंग में रंग जाती हैं। लेकिन सावन के पहले सोमवार का दिन बनारस के लिए थोड़ा और खास होता है। इस दिन यदुवंशी समाज यानी यादव बंधु परंपरागत रूप से बाबा विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) का जलाभिषेक करते हैं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि काशी की आपसी एकता और अटूट विश्वास का प्रतीक है।
1932 के अकाल से जुड़ी है परंपरा की कहानी
कहावतों और लोककथाओं के अनुसार, एक समय देश में भयंकर सूखा और अकाल पड़ा था। बारिश न होने के कारण पशु-पक्षी और इंसान पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे थे। तब काशी के यादव समाज (yadav samaj) ने संकट से मुक्ति के लिए संकल्प लिया कि वे सावन के पहले सोमवार को बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे।
मान्यता है कि संकल्प के बाद जैसे ही यादव बंधुओं ने जलाभिषेक किया, झमाझम बारिश होने लगी और अकाल का संकट दूर हो गया। उसी समय से यह परंपरा शुरू हुई और आज भी बिना रुके लगातार चली आ रही है।
दशाश्वमेध घाट से बाबा के द्वार तक भक्ति का माहौल
हर साल की तरह इस बार भी तड़के से ही हजारों की संख्या में यादव बंधु एकत्रित हुए। दशाश्वमेध घाट से पवित्र गंगाजल भरकर वे ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे लगाते हुए मंदिर की ओर बढ़े। डमरू की गूंज और शिव भजनों से पूरा रास्ता भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं के मन में बाबा के प्रति अपार श्रद्धा देखने को मिली।
प्रशासन की विशेष तैयारी और व्यवस्था
इस धार्मिक आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए मंदिर प्रशासन और पुलिस ने कड़े इंतजाम किए थे:
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प्रवेश व निकास: श्रद्धालुओं को सिंह द्वार से प्रवेश दिया गया और गेट नंबर 4 से निकासी रखी गई।
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यातायात नियंत्रण: सड़कों पर व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए आसपास के क्षेत्रों में ट्रैफिक को नियंत्रित किया गया।
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अस्थायी रोक: जलाभिषेक के दौरान कुछ समय के लिए आम दर्शनार्थियों का प्रवेश नियंत्रित रखा गया, जिससे व्यवस्था बनी रहे और सभी को आसानी से दर्शन मिल सकें।
यादव बंधुओं का यह जलाभिषेक बनारस की समृद्ध लोक-संस्कृति की एक सुंदर झलक पेश करता है, जहां हर परंपरा के पीछे समाज कल्याण की भावना छिपी होती है।
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