Madhya Pradesh की पावन धरा पर स्थित ओंकारेश्वर मंदिर (Omkareshwar Jyotirling) भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इंदौर शहर से लगभग 77 किलोमीटर दूर स्थित यह तीर्थ स्थल नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण में इस स्थल के महत्व का उल्लेख मिलता है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव तीनों लोकों का भ्रमण करने के बाद हर रात विश्राम करने के लिए इसी स्थान पर आते हैं। इसी कारण से यहाँ रोज़ाना भगवान शिव के शयन की विशेष व्यवस्था की जाती है और ‘शयन दर्शन’ का आयोजन होता है। आइए जानते हैं ओंकारेश्वर के पौराणिक इतिहास और यहाँ से जुड़ी परंपराओं के बारे में।

ओंकारेश्वर का स्वरूप और भौगोलिक स्थिति
ओंकारेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह नर्मदा नदी के बीच बने ‘ॐ’ के आकार के एक प्राकृतिक टापू पर स्थित है। इस द्वीप को मान्धाता पर्वत या मान्धाता टापू के नाम से जाना जाता है।
यह देश का अकेला ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर अमलेश्वर या ममलेश्वर मंदिर स्थित है। परंपरा के अनुसार, इन दोनों मंदिरों के शिवलिंगों को मिलाकर ही एक पूर्ण ज्योतिर्लिंग माना जाता है। दोनों ही स्थानों का धार्मिक दृष्टि से बराबर महत्व है।

ओंकारेश्वर से जुड़ी पौराणिक कथाएं
हिंदू धर्म में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य से जुड़ी कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं:
विंध्याचल पर्वत की तपस्या
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वतमाला के अधिष्ठाता देवता विंध्य ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ बालू और मिट्टी से शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव दो रूपों में प्रकट हुए—एक ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर। जिस स्थान पर मिट्टी का शिवलिंग दिव्य रूप में बदला, उसे ओंकारेश्वर कहा गया।
राजा मान्धाता का तप
इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धाता (जो भगवान राम के पूर्वज थे) ने इसी स्थान पर भगवान शिव की घोर साधना की थी। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए थे। राजा मान्धाता के नाम पर ही इस द्वीप का नाम मान्धाता टापू पड़ा।
देवताओं और दानवों का युद्ध
एक अन्य कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ और असुरों का पलड़ा भारी होने लगा, तब देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। शिव जी ने ओंकारेश्वर रूप में प्रकट होकर असुरों का पराभव किया और देवताओं की रक्षा की।
आदि शंकराचार्य की ज्ञानभूमि
ओंकारेश्वर का संबंध सनातन धर्म के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य के जीवन से भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसी स्थान पर स्थित एक गुफा में आदि शंकराचार्य अपने गुरु गोविन्द भगवत्पाद से मिले थे।
उन्होंने अपने गुरु के सान्निध्य में रहकर वेदांत की शिक्षा प्राप्त की थी। मंदिर परिसर के पास वह गुफा आज भी सुरक्षित है, जहाँ आदि शंकराचार्य की एक प्रतिमा स्थापित की गई है। यह गुफा श्रद्धालुओं और साधकों के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है।
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मंदिर का इतिहास और पुनर्निर्माण
ओंकारेश्वर मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है:
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परमार एवं चौहान काल: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मंदिर की मूल संरचना का निर्माण 11वीं शताब्दी में मालवा के परमार शासकों द्वारा कराया गया था। बाद में इसका प्रबंधन चौहान राजाओं के अधीन आ गया।
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मध्यकालीन प्रभाव: मध्यकाल के दौरान आक्रमणों से मंदिर को क्षति पहुँची, लेकिन इसकी मूल संरचना पूरी तरह नष्ट नहीं हुई।
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होल्कर राजवंश का योगदान: 18वीं शताब्दी में होल्कर राजवंश ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इसकी शुरुआत रानी गौतमा बाई होल्कर ने की, जिसे बाद में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने पूरा कराया।
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आधुनिक संरक्षण: भारत की आजादी के बाद से यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और स्थानीय प्रशासन की देखरेख में एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित है।
पूजा परंपराएं, परिक्रमा और आयोजन
ओंकारेश्वर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। यहाँ के मुख्य पूजा कार्यक्रमों में पार्थेश्वर पूजन, जलाभिषेक, पंचामृत पूजन और नर्मदा आरती शामिल हैं।
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तीन दिवसीय यात्रा और परिक्रमा: ओंकारेश्वर की धार्मिक यात्रा सामान्यतः तीन दिनों की मानी जाती है। मान्धाता टापू की दो परिक्रमाएँ होती हैं—एक छोटी परिक्रमा और एक बड़ी परिक्रमा, जिन्हें पूरा करना शुभ माना जाता है।
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सोमवार की नौका यात्रा: हर सोमवार की शाम मंदिर परिसर से भगवान ओंकारेश्वर की डोली यात्रा निकलती है। कोटितीर्थ घाट पर पूजा के बाद भगवान ओंकारेश्वर नाव में सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं।
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संध्या आरती: प्रतिदिन शाम को कोटितीर्थ घाट पर पवित्र नर्मदा नदी की आरती होती है, जिसमें सैकड़ों भक्त शामिल होते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष पूजन और शयन आरती का आयोजन किया जाता है।
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