Diwali in Vrindavan: वृंदावन में विधवा माताओं ने मनाई अनोखी दीपावली: समाज की बंदिशों को तोड़ यमुना में किया दीपदान

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मथुरा/वृंदावन। दीपों के पर्व दीपावली को हर कोई अपने तरीके से मनाता है, लेकिन इस बार वृंदावन में एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला जिसने समाज की सोच को झकझोर दिया। समाज की बनाई बंदिशों की जंजीरों को तोड़ते हुए हजारों निराश्रित और विधवा माताओं ने इस दीपावली पर यमुना के तट पर दीपदान कर एक नई सामाजिक परंपरा की शुरुआत की। सुलभ इंटरनेशनल की ओर से आयोजित इस भव्य दीपोत्सव ने न सिर्फ माताओं के चेहरों पर मुस्कान लौटाई, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि हर जीवन में खुशियों और सम्मान का अधिकार समान है।

शाम छह बजे से वृंदावन के प्रसिद्ध गोपीनाथ मंदिर परिसर में दीपोत्सव का शुभारंभ हुआ। सबसे पहले माताओं ने यमुना महारानी की आरती उतारी और फिर फूलों से सजी रंगोली पर दीप जलाए। जैसे-जैसे मिट्टी के दीयों की लौ जलती गई, वैसे-वैसे माताओं की आंखों में भी उम्मीद की रोशनी चमकने लगी। यमुना तट पर सैकड़ों दीयों की टिमटिमाती रोशनी ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। आरती और भजन के स्वर के साथ वृंदावन की गलियां “राधे-राधे” के जयघोष से गूंज उठीं।

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सुलभ इंटरनेशनल की कार्यकारी संयोजक श्रीमती नित्या पाठक ने बताया कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त उस सोच को बदलना है जो विधवा माताओं को भक्ति और उत्सव से दूर रखती है। उन्होंने कहा, “दीपोत्सव केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इन माताओं के आत्मबल, सम्मान और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है।”

इस अवसर पर गौरवानी दासी ने कहा कि अब वृंदावन की माताएं खुद को अकेला महसूस नहीं करतीं। भजन, कीर्तन और ऐसे आयोजनों से उनके जीवन में आत्मविश्वास और सुकून लौटा है। उन्होंने बताया कि पहले जहां ये माताएं सामाजिक उपेक्षा का शिकार थीं, वहीं अब वे मंदिरों में पूजा, भक्ति और सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं।

कार्यक्रम के समापन पर कई माताएं केशीघाट पहुंचीं, जहां उन्होंने यमुना में दीप प्रवाहित किए और एक-दूसरे को दीपावली की शुभकामनाएं दीं। चारों ओर फैली दीयों की रोशनी, भक्ति संगीत और यमुना की लहरों के बीच उनकी मुस्कानें यह दर्शा रही थीं कि समाज की रूढ़ियां धीरे-धीरे टूट रही हैं और आत्मसम्मान की लौ प्रज्वलित हो रही है।

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इस दीपदान ने यह साबित कर दिया कि भक्ति की कोई सीमा नहीं होती और हर हृदय में प्रकाश फैलाने की शक्ति होती है। वृंदावन का यह दीपोत्सव न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक प्रेरक पहल साबित हुआ।

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रिपोर्ट: उमर कुरैशी, मथुरा

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