Kaushambi जिला जेल: सलाखों के पीछे बदलती जिंदगी और ‘अशोक स्तंभ’ के निर्माण की प्रेरणादायक कहानी

Kaushambi

Share This Article

Kaushambi : सलाखों के पीछे कैद जिंदगी अक्सर निराशा की कहानी कहती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कौशांबी की जिला कारागार इन दिनों आशा, हुनर और नव-सृजन का अद्भुत अध्याय लिख रही है। यहां कैदी राष्ट्र के गौरव को गढ़ कर अपने अंदर छिपे अपराधबोध को मिटा रहे हैं।
ये बेकार पड़ी लकड़ियों को भारत के राजचिह्न ‘अशोक स्तंभ’ को आकार दे रहे हैं, यह करीब एक फीट के हैं। यहां के कैदियों के हाथों की यह काष्ठकला की सृजनशील ऊर्जा अब देशभर के सरकारी भवनों की शोभा बनेगी। ये वही कारागार हैं, फटे-पुराने कंबलों से बनाए गए जिनके ‘काऊ कोट’ से बेसहारा मवेशियों को ठंड से बचाया गया।

Kaushambi

‘मन की बात’ पर हुई तारीफ  

इस काऊ कोट की सराहना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ में भी की थी।  श्यामा तुलसी के सूखे डंठलों से बनाईं गईं इनकी मालाओं ने महाकुंभ में संत समाज को चकित कर दिया था। Kaushambi के टेवां स्थित जिला कारागार में वर्तमान में 523 कैदी और बंदी निरुद्ध हैं, जो प्रतिदिन निर्धारित कार्य करते हैं। ऐसे में जेल प्रशासन को विचार आया कि क्यों न बेकार पड़ी लकड़ियों से कुछ प्रयोग किया जाए।

ऐसे में हुनरबंद कारीगरों ने इनको तराश कर ऐसा आकार दिया, जो लुभाता ही नहीं है, बल्कि देश के प्रति सम्मान का भाव भी जगाता है। इसके बाद जीवन में कभी गलती करने वाले हाथों ने राष्ट्र की पहचान गढ़नी शुरू कर दी। यहां के कैदी राजचिह्न अशोक स्तंभ के अलावा जेल के फर्नीचर और कपड़ों की मदद से साज-सज्जा के सामान भी तैयार कर रहे हैं।
इसके बाद यह जेल अब सिर्फ सजा काटने का स्थान नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन और आत्मनिर्भरता का केंद्र बन गई है। हर तराशी गई लकड़ी, उकेरी गई आकृति इन कैदियों की एक नई शुरुआत की कहानी कह रही है।

Kaushambi

बंदी कल्याण कोष से मशीन मंगवाई

जेल अधीक्षक अजितेश मिश्रा के अनुसार, पहले कैदी हाथ से लकड़ी को तराश कर बच्चों के खिलौने, श्यामा तुलसी की माला आदि बनाते थे। उनकी लगन को देखते हुए बंदी कल्याण कोष से एक वर्ष पूर्व मशीन मंगवाई गई। मशीन आने के बाद अन्य कैदियों का भी रुझान इस ओर बढ़ा। आठ कैदी काष्ठकला के कुशल कारीगर बन चुके हैं।

पांच कैदी माटी कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर मिट्टी के कुल्हड़, फ्लावर पाट तैयार कर रहे हैं। दो माह में 10 से 12 अशोक स्तंभ की प्रतिकृति गढ़ी गई है, अभी इनका आकार छोटा लगभग एक फीट रखा गया है। यह बाजार में बिक्री के लिए नहीं है, इसे न्यायपालिका और कार्यपालिका के कार्यालयों में उपहार स्वरूप रखवाने की योजना है, इससे इन कैदियों के अंदर देश प्रेम की भावना आएगी। जेल प्रशासन भी बंदियों के लगन को देखते हुए इनके कौशल को निखारने का भरपूर प्रयास कर रहा है।

Kaushambi

प्रधानमंत्री कर चुके हैं काऊ कोट की सराहना

पूर्व में यहां के बंदी गोदाम में रखे फटे-पुराने कंबलों को जूट तथा बोरा के साथ लगाकर सिलते थे। इसे ‘काऊ कोट’ का नाम दिया गया। इन्हें सर्दियों में बेसहारा मवेशियों के लिए गो आश्रय स्थलों में पहुंचाया गया। बंदियों को आवंटित कंबल आमतौर पर लगभग तीन साल तक उपयोग होता है। उसके बाद इनका इस्तेमाल गायों के लिए कोट सिलने के लिए किया जाता है । इसकी जानकारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हुई तो उन्होंने 27 दिसंबर 2020 को ‘मन की बात’ में इस प्रयास की सराहना की थी।

यहां से जुटाए रुपयों से पैरवी के साथ कर रहे परिवार की मदद

जिला कारागार में श्यामा तुलसी के काफी पौधे हैं। सूखने पर इनके डंठल प्रति वर्ष बेकार हो जाते थे। कुछ कैदियों ने इसकी माला बनाने की इच्छा जताई। यह माला जेल प्रशासन ने प्रयागराज के महाकुंभ में संत समाज के समक्ष प्रस्तुत की तो वह भी हैरान हो गए। माला संतों को खूब पसंद आई।
काष्ठकला से जुड़कर आठ बंदी होने वाली आय से अपने मुकदमे की पैरवी कर रहे हैं और परिवार को आर्थिक मदद भी पहुंचा जा रहे हैं। जेल अधीक्षक का कहना है कि बंदियों द्वारा निर्मित उत्पाद की बिक्री के लिए लोक अदालत या अन्य सरकारी आयोजनों में स्टाल लगवाए जाते हैं। बिक्री के बाद खर्च आदि निकालने के बाद शेष बची रकम का भुगतान बंदी को कर दिया जाता है।
जेल में तैयार किए जाने वाले उत्पाद का स्टाल प्रयागराज में आयोजित माघ मेले व महाकुंभ में लगवाया गया था। साधु-संतों को श्यामा तुलसी की माला व मिट्टी के बर्तन खूब पसंद आए थे। अब राजचिह्न की वजह से बंदियों के हुनर को देशभर के सरकारी भवनों को पहचान दिलाई जाएगी। साथ ही न्यायालयों में भी राजचिह्न भेंट करने की योजना है। – अजितेश कुमार, जेल अधीक्षक कौशांबी। 

जानिए भारत के राजचिह्न के बारे में

भारत का राजचिह्न सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ की अनुकृति है, जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। मूलस्तंभ में शीर्ष पर चार सिंह हैं, जो एक-दूसरे की ओर पीठ किए हैं। इसके नीचे घंटे के आकार के पदम के ऊपर एक चित्र वल्लरी में एक हाथी, चौकड़ी भरता हुआ एक घोड़ा, एक सांड़ तथा एक सिंह की उभरी हुई मूर्तियां हैं।
इसके बीच-बीच में चक्र बने हैं। एक ही पत्थर को काटकर बनाए गए इस सिंह स्तंभ के ऊपर ‘धर्मचक्र’ रखा है। भारत सरकार ने यह चिह्न 26 जनवरी 1950 को अपनाया। इसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते हैं, चौथा दिखाई नहीं देता।

पट्टी के मध्य में उभरी हुई नक्काशी में चक्र है। उसके दाईं ओर एक सांड़ और बाईं ओर एक घोड़ा है। दाएं तथा बाएं छोरों पर अन्य चक्रों के किनारे हैं। आधार का पदम छोड़ दिया गया है। फलक के नीचे मुण्डकोपनिषद का सूत्र ‘सत्यमेव जयते’ देवनागरी लिपि में अंकित है।

यह भी पढ़ें: पुडुचेरी चुनाव 2026: मतदान केंद्र पर Robot ‘Nila’ ने जीता सबका दिल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Live Channel

Advertisement

[wonderplugin_slider id=1]

Live Poll

Are You Satisfied DD News UP

Also Read This