450 किमी. स्केटिंग कर अयोध्या पहुंची नौ साल की वंशिका, रामलला के किए दर्शन

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फिरोजाबाद की नौ वर्षीय स्केटर वंशिका ने 450 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर अयोध्या में रामलला के दर्शन किए। बुलंद हौसले वाली वंशिका ने कड़ाके की ठंड में मात्र छह दिन में यह यात्रा पूरी की। शिकोहाबाद की निवासी और कक्षा तीन की छात्रा वंशिका ने प्रतिदिन करीब 70 किलोमीटर स्केटिंग की। पिता शिवशंकर यादव सुरक्षा के लिए उनके पीछे कार से चल रहे थे। पांच वर्ष की उम्र से स्केटिंग सीख रही अंशिका का सपना है कि वह देश की बेटियों को मजबूत बनाए और स्केटिंग में मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करे। वंशिका की छुट्टियों में वैष्णो देवी दर्शन की योजना भी है।

9 साल की छात्रा ने 450 किलोमीटर स्केटिंग करके अयोध्या पहुंचकर भगवान श्रीराम के दर्शन किए 

एक अद्भुत संकल्प और साहस की कहानी में, 9 साल की वंशिका यादव ने केवल छह दिनों में 450 किलोमीटर की दूरी स्केटिंग करते हुए तय की और अयोध्या जाकर भगवान श्रीराम के दर्शन किए। यह यात्रा आगरा से शुरू हुई थी, जिसमें वंशिका ने सर्दी का सामना करते हुए अपने परिवार के साथ अयोध्या की ओर रुख किया।

वंशिका का सपना साकार हुआ

वंशिका, जो केंद्रीय विद्यालय आगरा में कक्षा तीन की छात्रा हैं, उनका सपना था कि वह स्केटिंग करते हुए अयोध्या जाएं और भगवान श्रीराम के दर्शन करें। इस सपना को पूरा करने के लिए वंशिका ने अपने परिवार को भी मनाया। उसकी मां, पूनम यादव, ने उसे सर्दी से बचाने के लिए गर्म कपड़े, ग्लव्स और अन्य आवश्यक सामान दिए। 3 जनवरी को वंशिका अपने पिता, भाई और चाचा के साथ अयोध्या के लिए रवाना हो गई।

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सर्दी में संघर्ष और सफर

वंशिका ने प्रतिदिन 70 किलोमीटर की दूरी तय की। रास्ते में स्थानीय लोगों ने उसे गर्मजोशी से स्वागत किया। इटावा में डीपीएस स्कूल के पास और औरैया में लोगों ने उसे माला पहनाकर सम्मानित किया। इसके बाद, नेशनल हाईवे अथॉरिटी की गाड़ी ने वंशिका को सुरक्षा प्रदान की और उसे यात्रा में मदद की।

6 जनवरी को वंशिका अयोध्या पहुंची, जहां भगवान श्रीराम के मंदिर में पहुंचने पर मंदिर ट्रस्ट के लोगों ने उनका स्वागत किया। दर्शन के बाद, परिवार ने शिकोहाबाद लौटने के लिए अपनी यात्रा शुरू की और मध्य रात्रि तक घर वापस पहुंचे।

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पिता द्वारा दिया गया प्रशिक्षण, बेटी ने पूरा किया सपना 

वंशिका के पिता, शिव शंकर यादव, ने पांच साल की उम्र से ही उसे स्केटिंग सिखाना शुरू किया था। चार साल में उसने इसमें महारथ हासिल कर ली थी। उसकी इस यात्रा से पूरे परिवार में खुशी की लहर है। वंशिका की जिद के आगे सभी परिवार के लोग हार गए और अंत में उन्होंने बेटी को अपनी इच्छा पूरी करने की अनुमति दी। यात्रा के दौरान, जब वंशिका थक जाती, तो परिवार ढाबों और होटलों में रुककर उसे आराम देता और फिर यात्रा जारी रखता।

वंशिका की यह कहानी संकल्प, परिवार का समर्थन और एक छोटे से बच्चे के बड़े सपने को पूरा करने की प्रेरणा देती है।

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