प्रयागराज: घुरपर सुजावन देव मंदिर पर यम द्वितीया मेला, भाई-बहन स्नान से मिलता है मोक्ष

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प्रयागराज: घुरपर सुजावन देव मंदिर पर यम द्वितीया मेला, भाई-बहन स्नान से मिलता है मोक्ष

प्रयागराज। घुरपर स्थित सुजावन देव मंदिर अपनी ऐतिहासिक और पौराणिक महत्ता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। यह मंदिर यमुना नदी के बीचों-बीच, लगभग सौ फुट ऊँचे टीले पर स्थित है, और इसकी प्राकृतिक छटा हर दर्शक को मंत्रमुग्ध कर देती है।

मंदिर की खासियत यह है कि दीपावली के दूसरे दिन यम द्वितीया (भैया दूज) पर यहां विशाल मेला लगता है। इस अवसर पर भाई-बहन यमुना नदी के तट पर स्नान करते हैं और मंदिर में पूजा-अर्चना कर पुण्य अर्जित करते हैं।

पुराणों के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना जी से मिलने सुजावन देव मंदिर आए थे। यमुना जी के आदर सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो कोई भी इस पवित्र तट पर अपनी बहन के साथ स्नान और उपासना करेगा, उसे मृत्युकाल का भय नहीं रहेगा और मोक्ष की प्राप्ति होगी।

मंदिर के पुजारी योगेन्द्र गिरी बताते हैं कि इस धार्मिक अनुष्ठान से भाई-बहन के संबंध और भी मजबूत होते हैं, और धार्मिक मान्यता के अनुसार यह पुण्य अर्जन का उत्तम तरीका है।

यम द्वितीया मेला और श्रद्धालुओं की आस्था

भैया दूज पर लगने वाला यह मेला लगभग दो दिनों तक चलता है। मेला न केवल प्रयागराज जिले बल्कि मध्य प्रदेश और आसपास के जिलों से भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

मेला में विभिन्न प्रकार के धार्मिक आयोजन, भंडारे, पूजा सामग्री की दुकानें और स्थानीय हस्तशिल्प भी देखने को मिलते हैं। लोग इस पवित्र स्थल पर अपने भाई-बहन के साथ आने और पुण्य कमाने के लिए विशेष रूप से उत्सुक रहते हैं।

मंदिर की प्राकृतिक और स्थापत्य सुंदरता

सुजावन देव मंदिर की स्थापत्य कला और प्राकृतिक छटा इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है। सौ फुट ऊँचे टीले पर स्थित होने के कारण यह मंदिर यमुना नदी की शांत लहरों के बीच एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है।

श्रद्धालु न केवल धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए बल्कि मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने और उसकी ऐतिहासिक महत्ता को देखने भी यहां आते हैं।

श्रद्धालुओं की मान्यता और परंपरा

भाई-बहन इस दिन नदी में स्नान करते हैं, फिर मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। लोग मानते हैं कि यमराज का यह वरदान उनके जीवन को सुरक्षित बनाता है और उनके भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है।

पुजारी योगेन्द्र गिरी का कहना है कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे आज भी लोग श्रद्धा के साथ निभाते हैं।

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