National Nutrition Week: स्वस्थ भारत की नींव है सही पोषण, जानें रोज की थाली में क्या खाएं

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National Nutrition Week : हम अक्सर कहते हैं कि देश की तरक्की के लिए अच्छी सड़कें, बड़ी इमारतें और मजबूत अर्थव्यवस्था जरूरी है। लेकिन इन सबके पीछे सबसे जरूरी चीज क्या है? स्वस्थ इंसान। जब देश के बच्चे, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग स्वस्थ होंगे, तभी भारत सही मायने में आगे बढ़ पाएगा।

इसी सोच के साथ हर साल 1 से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को पोषण और संतुलित आहार के प्रति जागरूक करना है। इसकी शुरुआत साल 1982 में हुई थी। यह सप्ताह हमें याद दिलाता है कि खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर को मजबूत बनाने के लिए भी जरूरी है।

तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पोषण हमारे लिए इतना जरूरी क्यों है और रोज की थाली में हम छोटे-छोटे बदलाव करके अपनी सेहत कैसे बेहतर कर सकते हैं।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह क्यों मनाया जाता है?

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह का सबसे बड़ा मकसद लोगों को सही खान-पान के बारे में जानकारी देना है। कई बार हम भरपेट खाना खा लेते हैं, लेकिन शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते। यानी पेट तो भर गया, लेकिन शरीर की जरूरत पूरी नहीं हुई।

हमारे शरीर को प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्शियम, मिनरल्स और दूसरे पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इनकी कमी लंबे समय तक बनी रहे तो कमजोरी, एनीमिया और बच्चों में विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।

इसलिए यह समझना जरूरी है कि पोषण सिर्फ ज्यादा खाना खाने का नाम नहीं है। सही मात्रा में सही चीजें खाना ही असली पोषण है।

संतुलित आहार में क्या होना चाहिए?

एक अच्छी थाली वह है जिसमें अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थ शामिल हों। सिर्फ रोटी या चावल से शरीर की हर जरूरत पूरी नहीं होती।

रोज के भोजन में दाल, चना, राजमा या दूसरे प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध या दही भी थाली को ज्यादा पौष्टिक बनाते हैं।

बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज भी अच्छे विकल्प हैं। इनमें कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं और इन्हें स्थानीय स्तर पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

सबसे अच्छी बात यह है कि संतुलित आहार के लिए हमेशा महंगी चीजें खरीदना जरूरी नहीं है। घर में उपलब्ध स्थानीय और मौसमी चीजों से भी पौष्टिक खाना तैयार किया जा सकता है।

भारत में कुपोषण की दोहरी चुनौती

भारत में कुपोषण की समस्या को समझना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यहां एक साथ दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाई देती हैं।

एक तरफ ऐसे बच्चे और महिलाएं हैं जिन्हें पर्याप्त पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता। इसकी वजह से बच्चों में कम वजन, कमजोरी और विकास से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। महिलाओं में आयरन की कमी से एनीमिया की समस्या भी देखने को मिलती है।

दूसरी तरफ शहरों में जंक फूड, मीठे पेय और कम शारीरिक गतिविधि की वजह से मोटापा बढ़ने की चिंता है। लंबे समय तक मोबाइल या टीवी के सामने बैठे रहना और रोजाना व्यायाम न करना भी समस्या को बढ़ा सकता है।

इसलिए आज पोषण का मतलब सिर्फ भूख मिटाना नहीं, बल्कि सही भोजन और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना भी है।

शुरुआती 1,000 दिन क्यों हैं इतने खास?

किसी बच्चे के स्वास्थ्य की नींव जन्म के बाद नहीं, बल्कि मां के गर्भ में ही पड़ जाती है। गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दो साल का होने तक के समय को शुरुआती 1,000 दिन कहा जाता है।

यह समय बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान मां को पौष्टिक और संतुलित भोजन मिलना जरूरी है।

जन्म के बाद शुरुआती समय में स्तनपान और फिर छह महीने की उम्र के बाद बच्चे को उचित ऊपरी आहार देना भी महत्वपूर्ण है। बच्चे के बढ़ने के साथ उसके भोजन में अलग-अलग पौष्टिक चीजों को शामिल किया जाना चाहिए।

इसके साथ घर की महिलाओं और बेटियों के खान-पान पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर परिवार में महिलाओं को ही पौष्टिक खाना नहीं मिलेगा, तो इसका असर उनकी सेहत पर पड़ सकता है।

महंगा खाना ही पौष्टिक नहीं होता

अच्छी सेहत का मतलब यह नहीं है कि हर दिन महंगे फल या विदेशी खाद्य पदार्थ ही खाए जाएं। हमारी भारतीय पारंपरिक थाली में पहले से ही कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं जो पौष्टिक होने के साथ-साथ आसानी से मिल जाते हैं।

दाल, चना, मूंगफली, बाजरा, ज्वार, रागी, हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध और दही जैसे खाद्य पदार्थ रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा बन सकते हैं।

कई बार हम पैकेट वाले स्नैक्स और मीठे पेय को आसानी से खरीद लेते हैं, लेकिन घर का बना साधारण खाना नजरअंदाज कर देते हैं। अगर हम स्थानीय और ताजा भोजन को प्राथमिकता दें, तो खान-पान की आदतों में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

साफ पानी और स्वच्छता भी पोषण का हिस्सा

पोषण की बात करते समय साफ पानी और स्वच्छता को भूलना ठीक नहीं है। अगर पीने का पानी साफ नहीं है या आसपास गंदगी रहती है, तो बार-बार बीमार पड़ने का खतरा बढ़ सकता है।

खासकर बच्चों के लिए साफ पानी, हाथ धोने की आदत और स्वच्छ वातावरण बहुत जरूरी है। बीमारी कम होगी तो शरीर भोजन से मिलने वाले पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल कर पाएगा।

इसलिए पोषण का संदेश सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें साफ पानी, स्वच्छता और स्वस्थ आदतें भी शामिल हैं।

पोषण अभियान और आंगनवाड़ी की भूमिका

देश में पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं और अभियान चलाए जा रहे हैं। पोषण अभियान और मिशन सक्षम आंगनवाड़ी जैसी पहल का उद्देश्य बच्चों, महिलाओं और परिवारों तक पोषण से जुड़ी जानकारी और सेवाएं पहुंचाना है।

गांव और मोहल्लों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर नजर रखने के साथ माताओं को खान-पान और देखभाल से जुड़ी जानकारी देती हैं।

लेकिन सिर्फ सरकारी योजनाओं से कुपोषण को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा। परिवार और समाज की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।

हर घर से शुरू हो सकता है बदलाव

पोषण सुधारने के लिए हमेशा बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। शुरुआत घर की छोटी-छोटी आदतों से की जा सकती है।

थाली में एक हरी सब्जी जोड़ना, दाल या दूसरे प्रोटीन स्रोत को नियमित करना, मौसमी फल खाना, ज्यादा पैकेट वाला खाना कम करना और पर्याप्त साफ पानी पीना जैसे छोटे कदम काफी मददगार हो सकते हैं।

बच्चों को भी बचपन से ही स्वस्थ खाने की आदत डालना जरूरी है। अगर उन्हें घर का पौष्टिक भोजन पसंद आने लगे, तो आगे चलकर उनकी खान-पान की आदतें बेहतर रह सकती हैं।

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह सिर्फ एक सप्ताह तक चलने वाला जागरूकता अभियान नहीं है। यह हमें रोज अपनी थाली और अपनी जीवनशैली पर ध्यान देने की याद दिलाता है।

स्वस्थ भारत की शुरुआत किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि हर घर की रसोई और हर परिवार की छोटी-छोटी आदतों से हो सकती है। अगर हम पौष्टिक भोजन, साफ पानी, स्वच्छता और स्वस्थ जीवनशैली को अपनी रोज की जिंदगी का हिस्सा बना लें, तो एक मजबूत और स्वस्थ भारत की नींव और मजबूत होगी।

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