जिनेवा/नई दिल्ली। यूनाइटेड नेशंस के मानवाधिकार उच्चायुक्त (UNHRC) वोल्कर टर्क ने अपनी हालिया भारत यात्रा के अनुभवों को साझा करते हुए भारतीय सिविल सोसाइटी की ‘जीवंतता’ और सक्रियता की जमकर प्रशंसा की है। जिनेवा में दिए गए अपने संबोधन में टर्क ने कहा कि वह भारत के दौरे के दौरान वहां की सिविल सोसाइटी के काम करने के तरीके और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने में इन संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
टर्क ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह बात दोहराई कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ‘सिविक स्पेस’ (Civic Space) का सुरक्षित होना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सिविल सोसाइटी बिना किसी बाहरी दबाव या रुकावट के अपना काम स्वतंत्र रूप से कर सके, क्योंकि वे ही जमीनी स्तर पर मानवाधिकारों के सजग प्रहरी होते हैं। अपनी यात्रा के दौरान टर्क ने भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर घरेलू और वैश्विक मानवाधिकारों के मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की थी।
एआई समिट और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ उच्च स्तरीय वार्ता
वोल्कर टर्क की यह पहली भारत यात्रा मुख्य रूप से ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ (AI Impact Summit) में शिरकत करने के उद्देश्य से थी। इस दौरान उन्होंने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की और डिजिटल भविष्य तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मानवाधिकारों पर पड़ने वाले प्रभावों पर गंभीर चर्चा की। टर्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी मुलाकात की जानकारी साझा करते हुए विदेश मंत्री का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक, क्षेत्रीय और घरेलू मानवाधिकारों के मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण समझना उनके लिए एक सकारात्मक अनुभव रहा।
एआई समिट के दौरान टर्क ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए कहा कि भविष्य की तकनीकों को ‘सत्ता’ की सेवा के बजाय ‘जनता’ की सेवा के लिए तैयार किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि एआई गवर्नेंस के ढांचे में मानवाधिकारों को बुनियादी तौर पर शामिल करना होगा ताकि ये तकनीकें समावेशी बनें और केवल कुछ खास लोगों तक सीमित न रहकर समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ हों। उन्होंने डिजिटल नवाचार में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर भी बल दिया।
यूएनएचआरसी में भारत का पाकिस्तान को कड़ा जवाब: ‘प्रोपेगैंडा से आती है जलन की बू’
वोल्कर टर्क की यात्रा और उनके सकारात्मक बयानों के बीच, जिनेवा में चल रहे यूनाइटेड नेशंस मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में भारत और पाकिस्तान के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली। 23 फरवरी से 31 मार्च तक चलने वाले इस सत्र के दौरान भारत ने पाकिस्तान द्वारा फैलाए जा रहे प्रोपेगैंडा का कड़ा विरोध किया। भारतीय प्रतिनिधि अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान और ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) द्वारा लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पाकिस्तान का लगातार झूठ अब ‘जलन की बू’ देने लगा है।
भारत ने ‘राइट टू रिप्लाई’ (जवाब देने का अधिकार) का इस्तेमाल करते हुए स्पष्ट किया कि जम्मू और कश्मीर का विकास और वहां की खुशहाली पाकिस्तान की अपनी आर्थिक और आंतरिक परेशानियों से बिल्कुल अलग है। अनुपमा सिंह ने पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा कि ओआईसी जैसे संगठन खुद को एक सदस्य देश के ‘इको चैंबर’ के रूप में इस्तेमाल होने दे रहे हैं, जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
जम्मू और कश्मीर: ‘अटूट और अभिन्न अंग’ की स्थिति पर भारत का संकल्प
यूएनएचआरसी के मंच से भारत ने एक बार फिर अपना पुराना और सख्त रुख दोहराया कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का एक अनिवार्य, अटूट और अभिन्न अंग था, है और हमेशा रहेगा। भारतीय प्रतिनिधि ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि 1947 में इस क्षेत्र का भारत में विलय पूरी तरह से कानूनी था, जो इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप था। भारत ने स्पष्ट किया कि इस विलय को किसी भी सूरत में बदला नहीं जा सकता।
भारत ने मानवाधिकार परिषद को यह भी अवगत कराया कि केंद्र शासित प्रदेशों में तेजी से हो रहा सामाजिक और आर्थिक विकास पाकिस्तान की हताशा का मुख्य कारण है। परिषद के 61वें सत्र में भारत की इस मजबूत पैरवी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या निराधार प्रोपेगैंडा को स्वीकार नहीं करेगा।
