नवाबों के शहर लखनऊ में जब राजनीति की बात होती है, तो अक्सर खींचतान ही नजर आती है। लेकिन दिल्ली के गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जो बताती है कि जब बात देश की साख की आती है, तो हमारे नेता सारे मतभेद किनारे रख देते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने दुनिया के 60 से अधिक देशों के साथ भारत के रिश्तों को और गर्माहट देने के लिए संसदीय मैत्री समूहों (Parliamentary Friendship Groups) का ऐलान किया है। यह कदम न सिर्फ कूटनीति के लिहाज से बड़ा है, बल्कि यह दुनिया को भारत की उस ‘एकजुटता’ का दर्शन कराएगा, जिसकी मिसाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के समय पेश की थी। तब भी दुनिया को यह संदेश गया था कि बाहरी मसलों पर पूरा हिंदुस्तान एक सुर में बोलता है।
सत्ता और विपक्ष, सब एक ही नाव पर सवार
इस मैत्री समूह की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें किसी एक पार्टी का बोलबाला नहीं है। ओम बिरला जी ने बड़े सलीके से इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के दिग्गजों को जगह दी है। मकसद साफ है— जब विदेशी धरती पर भारत का प्रतिनिधित्व हो, तो वहां ‘दल’ नहीं ‘देश’ दिखाई दे। इस फेहरिस्त में जो नाम शामिल हैं, उन्हें देखकर आप भी कहेंगे कि टीम इंडिया वाकई मजबूत है। इसमें अखिलेश यादव, प्रो. रामगोपाल यादव, शशि थरूर, असदुद्दीन ओवैसी, और अभिषेक बनर्जी जैसे प्रखर विपक्षी चेहरे हैं, तो वहीं रवि शंकर प्रसाद, अनुराग ठाकुर, सुधांशु त्रिवेदी और जगदंबिका पाल जैसे सत्ता पक्ष के माहिर खिलाड़ी भी शामिल हैं।
इन दिग्गजों के कंधों पर होगी जिम्मेदारी
मैत्री समूहों में शामिल अन्य प्रमुख नेताओं में पी. चिदंबरम, केसी वेणुगोपाल, कनिमोझी, सुप्रिया सुले, संजय सिंह, हेमा मालिनी, बिप्लब देब और श्रीकांत शिंदे जैसे नाम भी शामिल हैं। इन नेताओं को चुनने के पीछे की सोच यह है कि ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के अनुभवी हैं और दुनिया की बड़ी समस्याओं पर अपनी बात बेबाकी से रख सकते हैं।
इन 60 देशों से बढ़ेगी ‘यारी’
लोकसभा अध्यक्ष ने जिन देशों के साथ यह सेतु बनाया है, उनमें दुनिया के लगभग सभी प्रभावशाली मुल्क शामिल हैं। पहले चरण में अमेरिका, रूस, यूके, जर्मनी, जापान, फ्रांस, इजराइल, सऊदी अरब, और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को रखा गया है। इसके अलावा पड़ोसी देश जैसे नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव के साथ भी संसदीय रिश्तों को नई ऊंचाई दी जाएगी।
मैत्री समूह के मुख्य उद्देश्य:
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सीधा संवाद: भारतीय सांसद अब दूसरे देशों के सांसदों से सीधे बातचीत कर सकेंगे और अपने अनुभव साझा करेंगे।
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आपसी विश्वास: नियमित मुलाकातों और बैठकों से देशों के बीच भरोसा बढ़ेगा।
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वैश्विक चुनौतियां: व्यापार, तकनीक, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक नीतियों जैसे गंभीर विषयों पर सामूहिक चर्चा होगी।
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सीखने का मौका: एक-दूसरे की लोकतांत्रिक प्रणालियों और अच्छी नीतियों को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
पीएम मोदी की उसी पहल की झलक
यह पूरी कवायद प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन से मेल खाती है, जिसमें उन्होंने देश के हितों के लिए ‘बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल’ को तवज्जो दी थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जिस तरह अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं ने विदेशों में जाकर भारत का पक्ष रखा, उसने दुनिया को हैरान कर दिया था। अब लोकसभा के ये मैत्री समूह उसी सिलसिले को आगे बढ़ाएंगे।