बांग्लादेश में तारिक रहमान युग की शुरुआत: शेख हसीना के दौर का अंत और भारत के लिए नई चुनौतियां

बांग्लादेश में तारिक रहमान युग की शुरुआत

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पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजनीति ने एक बहुत बड़ा मोड़ लिया है। कल, 17 फरवरी 2026 को ढाका के जातीय संसद भवन में एक भव्य समारोह हुआ, जहाँ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह केवल एक नई सरकार का गठन नहीं है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में पिछले डेढ़ दशक से चले आ रहे शेख हसीना के ‘अवामी लीग’ युग का आधिकारिक अंत भी है।

सोशल मीडिया पर #BangladeshPolitics ट्रेंड कर रहा है और हर कोई यही पूछ रहा है कि अब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते किस करवट बैठेंगे? चलिए इस पूरे सियासी घटनाक्रम और इसके पीछे की कहानी को आसान भाषा में समझते हैं।

#BangladeshPolitics: तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना

करीब 17 साल के निर्वासन के बाद वतन लौटे तारिक रहमान के लिए यह जीत किसी बड़े राजनीतिक चमत्कार जैसी है। उनकी पार्टी BNP ने हाल ही में हुए आम चुनावों में भारी बहुमत हासिल किया। राष्ट्रपति ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस मौके पर भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला मौजूद रहे, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से उन्हें भारत आने का न्योता भी दिया।

तारिक रहमान के पीएम बनने के साथ ही लंबे समय बाद बांग्लादेश को कोई ‘पुरुष प्रधानमंत्री’ मिला है। इससे पहले दशकों तक खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच ही सत्ता का हस्तांतरण होता रहा था। तारिक रहमान ने शपथ के बाद कहा कि उनका लक्ष्य लोकतंत्र को बहाल करना और देश की अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत बनाना है।

End of Sheikh Hasina Era in Bangladesh

शेख हसीना, जिन्हें कभी बांग्लादेश की सबसे शक्तिशाली नेता माना जाता था, उनके लिए पिछला कुछ समय बेहद कठिन रहा। अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन के बाद उन्हें देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इस साल के चुनाव में उनकी पार्टी ‘अवामी लीग’ की अनुपस्थिति ने उनके दौर के अंत पर मुहर लगा दी।

जानकारों का कहना है कि शेख हसीना के दौर में भारत के साथ रिश्ते अपने ‘स्वर्ण युग’ में थे। सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी के मामले में दोनों देश बहुत करीब आ गए थे। लेकिन उनके जाने के बाद अब नई सरकार के साथ भारत को आपसी विश्वास का नया पुल बनाना होगा। शेख हसीना फिलहाल भारत में ही हैं और बांग्लादेश की नई सरकार उनके ‘प्रत्यर्पण’ (Extradition) की मांग कर सकती है, जो दिल्ली के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उलझन बन सकती है।

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर क्या होगा असर?

भारत के लिए BNP की सत्ता में वापसी को लेकर थोड़ी सावधानी बरतना जरूरी है। इतिहास गवाह है कि 2001-2006 के बीच जब BNP की सरकार थी, तब भारत के साथ रिश्ते काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे थे। उस समय उत्तर-पूर्व के विद्रोही समूहों की गतिविधियों और कट्टरपंथ के बढ़ने की खबरें आती रहती थीं।

हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को फोन कर जीत की बधाई दी है और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी के तहत सहयोग का भरोसा दिया है। तारिक रहमान ने भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान भारत के प्रति नरम रुख दिखाया और साझा विकास की बात कही। लेकिन चीन का बढ़ता दखल और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना भारत के लिए एक सतर्क रहने वाली चुनौती होगी।

Future Strategy for India

अब भारत को बहुत ही व्यावहारिक कूटनीति अपनानी होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी ‘रेड लाइंस’ को स्पष्ट रखते हुए नई सरकार के साथ आर्थिक और ऊर्जा संबंधों को और गहरा करना चाहिए। बांग्लादेश को भी पता है कि बिजली, व्यापार और चिकित्सा जैसे बुनियादी क्षेत्रों के लिए वह काफी हद तक भारत पर निर्भर है, इसलिए दोनों देशों के लिए सहयोग ही एकमात्र रास्ता है।

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