इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुका हो, तब दशकों बाद उसे सजा देना न्याय को एक औपचारिक और निरर्थक प्रक्रिया में बदल देता है। इसी आधार पर कोर्ट ने 42 वर्ष पुराने हत्या के मामले में 100 वर्ष की आयु पार कर चुके बुजुर्ग अभियुक्त को बरी कर दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्याय कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है, बल्कि वह मानवीय परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा होता है। कानून इस सच्चाई की अनदेखी नहीं कर सकता कि बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर होता जाता है और दूसरों पर निर्भरता बढ़ती है।
कोर्ट ने कहा कि सजा का मूल उद्देश्य सुधार और समाज के हित की रक्षा होता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने जीवन का बड़ा हिस्सा लंबित मुकदमे की प्रक्रिया में बिता चुका हो, तो सजा का नैतिक और व्यावहारिक महत्व समाप्त हो जाता है। ऐसे मामलों में दंड केवल प्रतीकात्मक रह जाता है।
अदालत ने यह भी माना कि दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया महज प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह स्वयं में एक कठोर दंड का रूप ले लेती है। करीब 40 वर्षों तक अनिश्चितता, मानसिक तनाव और सामाजिक कलंक झेलना किसी भी व्यक्ति के लिए अपने आप में सजा से कम नहीं है।
मामला अगस्त 1982 का है। हमीरपुर निवासी धनी राम उर्फ धनइयां और सत्तीदीन को हत्या के एक मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1984 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी और वे पिछले लगभग 40 वर्षों से जमानत पर थे। अपील लंबित रहने के दौरान सत्तीदीन की मृत्यु हो गई, जबकि जीवित बचे धनीराम की वर्तमान आयु 100 वर्ष हो चुकी है।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। साथ ही अभियुक्त की अत्यधिक उम्र और 42 वर्षों की असाधारण देरी ने उसे पूर्ण रूप से दोषमुक्त करने के लिए अतिरिक्त और ठोस आधार प्रदान किया।
यह भी पढ़ें: Mirzapur धर्मांतरण मामले में मौलवी गिरफ्तार, अभी तक 8 लोगों की हो चुकी है गिरफ्तारी