Lucknow में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों और सचिवों के सम्मेलन का दूसरा दिन विधायकों की जवाबदेही और लोकतंत्र के सशक्तिकरण पर समर्पित रहा। विधानसभा मंडप में आयोजित इस सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से आए विधानसभा अध्यक्षों ने विधायकों के लिए एक संगठित और प्रभावी सिलबेस तैयार करने की आवश्यकता रेखांकित की। सम्मेलन में यह साफ किया गया कि विधायिका लोकतंत्र की आत्मा है और सशक्त, प्रशिक्षित तथा मूल्यनिष्ठ जनप्रतिनिधि ही लोकतंत्र की नींव हैं।

दूसरा दिन: विधायी प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकी, विधायक क्षमता और जवाबदेही पर जोर
Lucknow में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के दूसरे दिन मंगलवार को तीन प्रमुख विषयों विधायी प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकी का उपयोग, विधायकों की क्षमता-वृद्धि और विधायिकाओं की जनता के प्रति जवाबदेही पर विचार-विमर्श किया गया। सत्र में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला उपस्थित रहे, चर्चा का संचालन राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने किया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के प्रयासों की सराहना करते हुए सर्वोत्तम विधायी प्रक्रियाओं और विधायकों की क्षमताओं के रचनात्मक उपयोग पर जोर दिया। वहीं, उपसभापति हरिवंश ने विधान मंडलों की कार्यकुशलता बढ़ाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका और संसद-विधानसभाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। आज सम्मेलन का समापन होगा, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सम्मेलन को संबोधन करेंगे ।

विधायक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर जोर
गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष शंकर चौधरी ने बताया कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए शिक्षित और सक्षम जनप्रतिनिधियों का होना अत्यंत आवश्यक है। आज विधायक की भूमिका केवल सदन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्हें कानून निर्माण, बजट पर विचार, क्षेत्रीय विकास, प्रशासनिक समन्वय और पार्टी संवाद जैसे कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। इसलिए उनके लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण अनिवार्य हो गया है। गुजरात विधानसभा में विधायी ड्राफ्टिंग, बजट प्रक्रिया, साइबर सुरक्षा और डिजिटल कार्यप्रणाली पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए गए हैं। स्वास्थ्य परीक्षण, योग और ध्यान जैसे प्रयोग भी किए गए, जिनसे सदन की कार्यकुशलता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

सहयोग और डिजिटल नवाचार
चौधरी ने बताया कि विधायक क्रिकेट लीग और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों के बीच समन्वय बढ़ाया गया। डिजिटल नवाचार के तहत पेपरलेस विधानसभा, ऑनलाइन प्रश्नोत्तर और डेटा आधारित बजट तैयारी ने कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जनोन्मुख बनाया। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्रशिक्षित और सशक्त जनप्रतिनिधि अनिवार्य हैं।
लोकतंत्र संवाद से सशक्त होता है
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने कहा कि लोकतंत्र का मूल आधार जनता के प्रति विधायकों की जवाबदेही है। जनप्रतिनिधि सत्ता के स्वामी नहीं, बल्कि संविधान और जनता के सेवक हैं। विधानमंडल में विधायकों का अधिकार पद से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से प्राप्त होता है। कानून निर्माण, कार्यपालिका की निगरानी और गरिमापूर्ण बहस जनहित की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।
यह भी पढ़ें: Saina Nehwal: ओलंपिक पदक विजेता साइना नेहवाल ने बैडमिंटन से लिया संन्यास, कहा ‘अब शरीर साथ नहीं दे रहा’
अल्पसंख्यकों और सामाजिक न्याय की सुरक्षा
पंजाब के अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने कहा कि लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों, दलितों और गरीबों के हितों की रक्षा होनी चाहिए। सदन के भीतर सौहार्द बिगाड़ने वाले बयानों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने सदन में अनुशासन और आपसी सम्मान बनाए रखने का महत्व रेखांकित किया।
जनभावनाओं को विधानमंडल तक पहुँचाना
हरियाणा के अध्यक्ष हरविंदर कल्याण ने कहा कि विधानमंडल जनता की भावनाओं, आशाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करने का माध्यम है। प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थायी समितियां और वित्तीय नियंत्रण तभी प्रभावी हैं, जब उनके पीछे संवैधानिक दृष्टि और जनता के प्रति संवेदनशीलता हो। हरियाणा विधानसभा में विधायी ड्राफ्टिंग, प्रशिक्षण कार्यक्रम, राजनीतिक शोध केंद्र और युवा संसद कार्यक्रम जैसे प्रयासों से विधायकों की क्षमता बढ़ाई गई।
संविधान के ट्रस्टी के रूप में व्यवहार
राजस्थान के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवन जीने का माध्यम है। विधायिका की जवाबदेही संविधान की भावना को कानून में ढालने में निहित है। सदन में बैठते समय विधायकों को संविधान के ट्रस्टी के रूप में व्यवहार करना चाहिए।
यह भी पढ़ें: Meerut: सेना भर्ती के नाम पर ठगी करने वाले 4 गिरफ्तार
निष्पक्ष अध्यक्ष लोकतंत्र की रक्षक
गोवा के अध्यक्ष डॉ. गणेश गांवकर ने बताया कि कार्यपालिका पर प्रभावी निगरानी उत्तरदायी शासन की आधारशिला है। डिजिटल युग में नागरिकों, विशेषकर युवाओं की भागीदारी लोकतंत्र को सशक्त करने का अवसर है। अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
सम्मेलन में यह स्पष्ट हुआ कि विधायकों की सशक्तीकरण, प्रशिक्षण और जवाबदेही लोकतंत्र के विकास और उसकी विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य हैं। विभिन्न राज्यों के अध्यक्षों के अनुभव और सुझाव इस दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। एक सशक्त और प्रशिक्षित विधायक ही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत है और इसके माध्यम से भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर होगा।