Diwali 2026: विविधता और परंपरा का पर्व दीपावली का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

Diwali 2026

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Diwali 2026: भारत में दीपावली केवल दीपों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह देश की अनूठी सांस्कृतिक विविधता, आस्था और ऐतिहासिक गौरव का एक जीवंत प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाने की अपनी अनूठी परंपराएं हैं, जो इसकी बहुलता को दर्शाती हैं। उत्तर भारत में जहां भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में आतिशबाजी और भव्य लक्ष्मी-गणेश पूजन की परंपरा है, वहीं गुजरात में व्यापारी वर्ग इस अवसर पर लक्ष्मी पूजा के साथ अपने नए व्यापारिक वर्ष और नए बही-खातों की शुरुआत करता है। इसी के साथ, पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा में इस रात्रि महाकाली की विशेष ‘महानिशा’ पूजा का विधान है, जो शक्ति, साहस और नकारात्मक ऊर्जा के विनाश का संदेश देती है।

धर्म, मर्यादा और पौराणिक गाथाओं के शाश्वत संदेश

इस पावन पर्व की जड़ें भारतीय इतिहास और पुराणों में बहुत गहरी हैं, जो इसके महत्व को कई आयाम देती हैं। त्रेता युग में चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर, लंकापति रावण का संहार करने के पश्चात जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। यह प्रकाश पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर विनय की विजय का शाश्वत प्रतीक बन गया। श्रीराम के जीवन के मूल्य- मर्यादा, कर्तव्य, सत्य और त्याग हैं, जो दीपावली को केवल एक दिन का उत्सव न बनाकर जीने की एक कला बनाते हैं। इसके अलावा, महाभारत कालीन प्रसंग के अनुसार, पांडवों के तेरह वर्ष के वनवास और अज्ञातवास की अवधि पूरी होने पर कार्तिक अमावस्या के दिन ही उनके हस्तिनापुर लौटने की कथा मिलती है, जिसकी खुशी में प्रजा ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था।

ऐतिहासिक धरोहर, परंपराएं और खगोलीय महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, क्षीर-सागर के मंथन के वक्त कार्तिक अमावस्या के दिन ही धन की देवी माता लक्ष्मी और आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे, जिसके कारण इस दिन लक्ष्मी पूजन के साथ धन्वंतरि की भी आराधना की जाती है। जैन परंपरा में यह दिन विशेष महत्व रखता है क्योंकि जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को इसी दिन बिहार के पावापुरी में मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जिसे आत्मज्ञान और अज्ञान से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। वहीं सिख समुदाय में इसे ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी ऐतिहासिक दिन छठे गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से 52 राजाओं को मुक्त कराकर लौटे थे, जो स्वतंत्रता और अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक है। खगोल विज्ञान की दृष्टि से भी, कार्तिक अमावस्या का यह समय ऋतु परिवर्तन (शरद से हेमंत) का काल है, जिसमें दीपकों की ऊष्मा और पूजन सामग्री पर्यावरण के रोगाणुओं को नियंत्रित करने में वैज्ञानिक रूप से भी लाभकारी मानी जाती है।

यह भी पढ़ें: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को दी दीपावली की शुभकामनाएं, जवानों संग मनाएंगे प्रकाश पर्व

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