पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य में अब सियासी दलों का चुनावी शोर अपने चरम पर है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने X हैंडल (पूर्व में ट्विटर) पर एक लंबा पोस्ट जारी कर विपक्ष पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि वर्ष 2005 से पहले राज्य में मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए कोई काम नहीं होता था, और पूर्ववर्ती सरकारों ने इस समाज को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया।
एनडीए बनाम महागठबंधन – चुनावी प्रचार ने पकड़ी रफ्तार
बिहार चुनाव को लेकर इस समय सभी प्रमुख दल पूरी ताकत से मैदान में उतर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, तेजस्वी यादव, और नीतीश कुमार समेत सभी बड़े नेता लगातार रैलियां और जनसभाएं कर रहे हैं।
कल बिहार में पीएम मोदी, अमित शाह और तेजस्वी यादव ने अलग-अलग जिलों से चुनावी प्रचार का आगाज़ किया। वहीं, जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से नीतीश कुमार सोशल मीडिया पर लगातार अपने कामकाज और सरकार की नीतियों को सामने रख रहे हैं।
नीतीश कुमार का बड़ा बयान – “2005 से पहले मुस्लिम समुदाय के लिए कोई काम नहीं होता था”
मुख्यमंत्री ने अपने X पोस्ट में लिखा कि “वर्ष 2005 से पहले बिहार में मुस्लिम समाज के लिए किसी भी तरह की योजनाएं नहीं थीं। जो लोग तब सत्ता में थे, उन्होंने मुस्लिम समाज को सिर्फ वोट के लिए इस्तेमाल किया। राज्य में आए दिन सांप्रदायिक झगड़े होते रहते थे और सरकारें चुप रहती थीं।”
उन्होंने आगे कहा कि “24 नवंबर 2005 को जब हमारी सरकार बनी, तब से हमने मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए लगातार कार्य किए हैं।”
अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का जिक्र
नीतीश कुमार ने अपने पोस्ट में लिखा कि उनकी सरकार ने अल्पसंख्यक समाज के कल्याण के लिए बजट में ऐतिहासिक वृद्धि की है।
उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के बजट में 306 गुणा वृद्धि करते हुए 1080.47 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि “अब तक 8000 से अधिक कब्रिस्तानों की घेराबंदी कराई जा चुकी है, जबकि 1273 और कब्रिस्तानों को चिन्हित किया गया है। इनमें से 746 कब्रिस्तानों की घेराबंदी पूरी हो चुकी है और बाकी पर तेजी से काम चल रहा है।”
मदरसों और मुस्लिम महिलाओं के लिए नई पहलें
नीतीश कुमार ने अपने पोस्ट में बताया कि वर्ष 2006 से मदरसों का निबंधन और सरकारी मान्यता शुरू की गई। उन्होंने लिखा कि “मदरसा शिक्षकों को अब सरकारी शिक्षकों के समान वेतन दिया जा रहा है।”
साथ ही उन्होंने कहा कि मुस्लिम परित्यक्ता और तलाकशुदा महिलाओं को रोजगार सहायता देने के लिए 2007 में 10 हजार रुपये की राशि दी जाती थी, जिसे अब बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दिया गया है।
इसके अलावा “तालीमी मरकज” और “हुनर योजना” के माध्यम से अल्पसंख्यक छात्रों को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की पहल की गई है।
शिक्षा, छात्रवृत्ति और कोचिंग योजनाओं का लाभ
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य में मुस्लिम युवाओं के लिए छात्रवृत्ति, मुफ्त कोचिंग, छात्रावास निर्माण और अनुदान योजनाएं चलाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार चाहती है कि मुस्लिम समाज के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करें और आत्मनिर्भर बनें।
नीतीश कुमार ने लिखा कि अल्पसंख्यक उद्यमी योजना के तहत छोटे व्यवसायियों को ऋण और प्रशिक्षण सुविधा दी जा रही है ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें।
सामाजिक सौहार्द और शांति पर फोकस
नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि 2005 से पहले राज्य में आए दिन हिंदू-मुस्लिम झगड़े होते थे, लेकिन अब बिहार में सांप्रदायिक सौहार्द कायम है। उन्होंने कहा कि “हमारी सरकार ने ऐसा माहौल बनाया है जहां सभी धर्म और समुदाय शांति से रह सकें। यह हमारे विकास मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
उन्होंने कहा कि “बिहार में अब किसी भी धर्म के खिलाफ भेदभाव नहीं होता। हमारी नीति हमेशा रही है – सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास।”
मुस्लिम वोट बैंक पर निगाहें
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नीतीश कुमार का यह बयान चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है। बिहार में मुस्लिम वोटर्स करीब 17 प्रतिशत हैं और लगभग 60 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
नीतीश कुमार के इस पोस्ट को महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि यह बयान चुनावी फायदा उठाने की कोशिश है, लेकिन एनडीए इस बार अपनी “सबका साथ, सबका विकास” नीति पर भरोसा जता रहा है।
