पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar election 2025) का सियासी मैदान अब पूरी तरह गर्म हो चुका है। इस बार मुकाबला केवल विरोधी दलों के बीच नहीं, बल्कि एनडीए के सहयोगी दलों के भीतर भी दिलचस्प बन गया है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सिंबल पर अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता भी चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ सहयोगियों के बीच खींचतान का संकेत देती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि बीजेपी ने अपनी रणनीति कितनी गहराई से तैयार की है।
गोविंदपुर विधानसभा सीट इसका सबसे ताजा उदाहरण है। यहां विनिता मेहता को एलजेपी (रामविलास) की प्रत्याशी घोषित किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि विनिता नवादा बीजेपी के जिलाध्यक्ष अनिल मेहता की पत्नी हैं और लंबे समय से बीजेपी टिकट पर इसी सीट से चुनाव की तैयारी कर रही थीं। लेकिन एनडीए के सीट बंटवारे में यह सीट एलजेपीआर को चली गई।
चिराग पासवान ने अनिल मेहता की मौजूदगी में विनिता को एलजेपीआर का सिंबल सौंप दिया। यानी, चेहरा बीजेपी का, लेकिन झंडा एलजेपीआर का।
यही नहीं, रजौली (सुरक्षित) सीट पर भी एलजेपीआर ने विमल राजवंशी को टिकट दिया है, जो बीजेपी अनुसूचित मोर्चा के जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। यह सीट भी पहले बीजेपी की मानी जाती थी।
यानी, एक तरफ एलजेपीआर को सीटें दी गईं, दूसरी तरफ उम्मीदवार वही हैं जो बीजेपी के संगठन से जुड़े रहे हैं।
नौ सीटों पर “एलजेपीआर सिंबल, बीजेपी उम्मीदवार”
जानकारी के मुताबिक, एलजेपीआर को मिली 29 सीटों में से नौ सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार उतारे गए हैं।
इनमें गोविंदपुर, रजौली, बख्तियारपुर, मनेर, बोचहा, चेनारी, परवता, बोधगया और बेलसंड जैसी सीटें शामिल हैं।
इनमें से कई सीटें पहले जदयू या बीजेपी के हिस्से में थीं, लेकिन इस बार उन्हें एलजेपीआर को दे दिया गया है।
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोरों पर है कि आखिर बीजेपी ने सीट बंटवारे पर कोई आपत्ति क्यों नहीं जताई?
इस पर राजनीतिक विश्लेषक दो वजह बताते हैं —
पहला, चिराग पासवान का प्रधानमंत्री मोदी से नजदीकी रिश्ता, और दूसरा, एलजेपीआर का एनडीए के भीतर चौथा सबसे बड़ा दल होना, जिसके पांच सांसद लोकसभा में हैं।
बीजेपी को इस बात का भी फायदा है कि वह एलजेपीआर के सिंबल के जरिए अपनी पहुंच उन सीटों पर भी बनाए रखेगी, जहां उसका परंपरागत वोट बैंक कमजोर था।
उम्मीदवारों की सियासी कहानी
बख्तियारपुर से अरुण कुमार, मनेर से जितेंद्र यादव, बोचहा से बेबी देवी, चेनारी से मुरारी प्रसाद गौतम, परवता से बाबूलाल शौर्य, बोधगया से श्यामदेव पासवान, और बेलसंड से अमित कुमार एलजेपीआर के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे।
इनमें से कई नेता पहले बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं या पार्टी से जुड़े पदों पर रह चुके हैं।
सहयोगी दलों में बेचैनी
हालांकि एनडीए के भीतर सब कुछ शांत नहीं है। हम पार्टी के प्रमुख जीतन राम मांझी और आरएलएम के नेता उपेंद्र कुशवाहा पहले ही अपने-अपने हिस्से की सीटों को लेकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं।
अब एलजेपीआर की सीटों पर बीजेपी नेताओं की एंट्री ने इस असंतोष को और गहरा दिया है।
जदयू भी इसे “राजनीतिक ओवरस्मार्टनेस” के तौर पर देख रही है, क्योंकि जिन सीटों को जदयू ने छोड़ा, वहां अब बीजेपी के चेहरे एलजेपीआर के सिंबल से चुनाव लड़ रहे हैं।
अंदरूनी रणनीति या मजबूरी?
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि इसमें कोई विवाद नहीं है, बल्कि यह “समन्वय का हिस्सा” है।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम बीजेपी की एक “डुअल स्ट्रैटेजी” है —
जहां पार्टी सहयोगी दल को सम्मान देते हुए भी हर सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है।
ऐसा कदम उसे न केवल संगठनात्मक तौर पर मजबूत रखता है, बल्कि भविष्य में सीटों के पुनर्वितरण में भी फायदा दिला सकता है।
नतीजों से तय होगी सियासी दिशा
अब सवाल यह है कि क्या एलजेपीआर के सिंबल पर बीजेपी उम्मीदवारों का यह प्रयोग जनता को पसंद आएगा?
या फिर मतदाता इस समीकरण को “सीट शेयरिंग की सियासी चाल” के तौर पर देखेंगे।
हालांकि एनडीए खेमे को उम्मीद है कि बीजेपी और एलजेपीआर के संयुक्त चेहरे से वोटों का बिखराव रुकेगा और गठबंधन को फायदा होगा।
