Calcutta High Court: जीव दया, पशु कल्याण और मवेशियों के संरक्षण को कानूनी रूप से मजबूत करने की दिशा में देश के विभिन्न राज्यों में कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में, पश्चिम बंगाल में पशुओं के अवैध वध को रोकने और उनकी आयु व स्वास्थ्य मानकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ (West Bengal Animal Slaughter Control Act, 1950) के तहत प्रशासनिक नियमों को कड़ाई से लागू करने का प्रयास किया गया है।
हालांकि, आगामी त्योहार से पहले मवेशियों के संरक्षण और चिकित्सा परीक्षण से जुड़े इन नियमों तथा अनिवार्य ‘फिट सर्टिफिकेट’ की व्यवस्था के खिलाफ कुछ राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) का रुख किया है, जिससे यह मामला कानूनी प्रक्रिया के दायरे में आ गया है।
यह पूरा मामला Calcutta High Court के चीफ जस्टिस सुजय पॉल (Chief Justice Sujoy Paul) और जस्टिस पार्थ सारथी सेन (Justice Partha Sarathi Sen) की खंडपीठ (Division Bench) के समक्ष विधिक समीक्षा के लिए प्रस्तुत हुआ।
नियमों के विरोध में Calcutta High Court पहुंचे टीएमसी और वामपंथी नेता
पशु कल्याण को प्राथमिकता देने वाले इन वैधानिक नियमों को शिथिल कराने या रोकने के उद्देश्य से विपक्ष के कई नेताओं ने Calcutta High Court में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है:
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अखरुज्जमां की जनहित याचिका: नियमों की विधिक कड़ाई को चुनौती देने वाली इस कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक अखरुज्जमां द्वारा जनहित याचिका दायर की गई।
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महुआ मोइत्रा का समर्थन: इस मामले की अदालती कार्यवाही के दौरान तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) भी व्यक्तिगत रूप से कोर्ट रूम में उपस्थित रहीं। उन्होंने कानून के इन कड़े प्रावधानों को दी गई चुनौती का पुरजोर समर्थन किया।
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वामपंथी दल भी पीछे नहीं: टीएमसी के साथ ही, CPI-ML Liberation की राज्य इकाई ने भी इस मवेशी संरक्षण व्यवस्था के खिलाफ एक अलग जनहित याचिका दायर कर इसे कोर्ट में चुनौती दी है।
क्या हैं पशु संरक्षण और कल्याण से जुड़े ये कड़े नियम?
न्यायालय के समक्ष विचाराधीन यह व्यवस्था मूल रूप से 1950 के मवेशी वध नियंत्रण कानून के कड़े और पारदर्शी कार्यान्वयन से जुड़ी है। इसके तहत सांड, बैल, गाय, बछड़े और भैंस जैसे मवेशियों के अंधाधुंध वध को रोकने के लिए निम्नलिखित मानक तय किए गए हैं:
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अनिवार्य ‘फिट सर्टिफिकेट’: नए प्रशासनिक नियमों के अनुसार, किसी भी मवेशी के संबंध में कोई भी कदम उठाने से पहले सरकारी और अधिकृत पशु चिकित्सकों द्वारा उसकी गहन चिकित्सा जांच की जाएगी और एक आधिकारिक ‘फिट सर्टिफिकेट’ (Fit Certificate) जारी होना अनिवार्य होगा। इससे बीमार या अनुपयुक्त पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता पर रोक लगेगी।
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14 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा: नियमों में स्पष्ट और वैज्ञानिक आधार तय किया गया है कि केवल उन्हीं पशुओं को ही इस प्रक्रिया के योग्य माना जा सकता है जिनकी आयु 14 वर्ष से अधिक हो चुकी हो, या जो किसी गंभीर शारीरिक चोट, बुढ़ापे, विकृति या किसी असाध्य लाइलाज बीमारी के कारण स्थायी रूप से अक्षम (Incapacitated) हो चुके हों। यह नियम उपयोगी और दुधारू मवेशियों के असमय वध को रोकने में बेहद मददगार माना जा रहा है।
कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के तर्क और हाई कोर्ट का कड़ा रुख
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और विपक्षी नेताओं के वकीलों ने दलील दी कि इन कड़े नियमों, आयु सीमा की शर्तों और चिकित्सा प्रमाण पत्रों की अनिवार्यता के कारण आगामी त्योहार के दौरान होने वाली पारंपरिक गतिविधियों और मवेशी बाजारों के व्यापारिक संचालन में कठिनाई आएगी।
अदालत का अंतरिम आदेश और विधिक प्रक्रिया: खंडपीठ ने मामले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं और दोनों पक्षों की शुरुआती दलीलों को सुना। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जल्दबाजी में दायर की गई इन याचिकाओं की प्रतियां (कॉपियां) अभी तक प्रतिवादी पक्षों, यानी राज्य सरकार और मुख्य कानूनी पक्षों को नियमानुसार नहीं सौंपी गई हैं।
इस प्रक्रियात्मक त्रुटि और तकनीकी कमी को देखते हुए हाई कोर्ट ने किसी भी प्रकार की जल्दबाजी में अंतरिम राहत देने या मुख्य सामग्री पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया और मामले को स्थगित कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी आवश्यक कानूनी दस्तावेजों की आपूर्ति पूरी होने के बाद ही इस मामले को अगले दिन पहली प्राथमिकता वाले आइटम (First Item) के रूप में सूचीबद्ध कर विधिक रूप से सुना जाए।






