Lalu Prasad Yadav को सुप्रीम कोर्ट से झटका: जमीन के बदले नौकरी मामले में याचिका खारिज

Lalu Prasad Yadav

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बिहार की राजनीति के दिग्गज नेता Lalu Prasad Yadav के लिए कानूनी मोर्चे पर मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें एक बड़ा झटका लगा है, जिससे उनके परिवार और समर्थकों की चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें एक छोटी सी राहत भी दी है, लेकिन मुख्य मामले में उनकी दलीलें काम नहीं आईं।

कोर्ट का फैसला और सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में Lalu Prasad Yadav ने एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज की गई एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर की बेंच ने इस पर सुनवाई करते हुए याचिका को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

याचिका में तर्क दिया गया था कि सीबीआई ने मुकदमा चलाने के लिए जरूरी कानूनी मंजूरी नहीं ली थी, लेकिन अदालत ने सुझाव दिया कि वे इन तकनीकी पहलुओं को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के सामने उठा सकते हैं।

पेशी से मिली थोड़ी राहत

भले ही मुख्य याचिका खारिज हो गई हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने Lalu Prasad Yadav को एक राहत जरूर दी है। कोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अधीनस्थ अदालत की कार्यवाही में पेश होने से छूट दे दी है। उनकी सेहत और उम्र को देखते हुए यह एक महत्वपूर्ण रियायत मानी जा रही है। इसका मतलब है कि अब उन्हें हर तारीख पर खुद कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने होंगे, जो उनके स्वास्थ्य के लिहाज से काफी जरूरी था।

क्या है यह पुराना विवाद?

यह पूरा मामला उस समय का है जब Lalu Prasad Yadav, 2004 से 2009 के बीच देश के रेल मंत्री थे। आरोप है कि उस दौरान रेलवे के ग्रुप डी पदों पर नियुक्तियां करने के बदले लोगों से जमीन लिखवाई गई थी। इस केस में न केवल उनका नाम है, बल्कि उनके परिवार के अन्य सदस्य जैसे राबड़ी देवी, मीसा भारती और तेजस्वी यादव का नाम भी शामिल है।

ईडी ने पिछले साल दावा किया था कि इस कथित घोटाले में लगभग 600 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ है। इसी साल जनवरी में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने भी इस मामले में कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे एक सुनियोजित तरीके से किया गया काम बताया था।

Lalu Prasad Yadav के लिए कानूनी लड़ाई अभी लंबी चलने वाली है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब सारा ध्यान निचली अदालत के ट्रायल पर टिक गया है। हालांकि पेशी से छूट मिलना उनके लिए राहत की बात है, लेकिन मुख्य आरोपों से पीछा छुड़ाना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले के बाद चर्चाएं तेज हो गई हैं।

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