Baghpat के बिनौली क्षेत्र के दौझा गांव की लीलावती की कहानी ने सबको भावुक कर दिया। पति की 2015 में मौत के बाद वह मानसिक रूप से बीमार होकर लापता हो गई थीं। परिवार ने काफी तलाश की, लेकिन कोई पता नहीं चला और गुमशुदगी दर्ज कराई गई।
छह–सात साल बाद परिवार ने उन्हें मृत मानकर श्राद्ध भी कर दिया। लेकिन 16 मार्च को जम्मू-कश्मीर से पुलिस और सेना का फोन आया कि लीलावती जीवित हैं। पुष्टि के बाद उनके बेटे जम्मू-कश्मीर पहुंचे और मां को देखकर भावुक हो गए। 20 मार्च को जब लीलावती घर लौटीं तो पूरे गांव में खुशी का माहौल बन गया। परिवार ने डीजे के साथ जश्न मनाया और लीलावती ने भी खुशी में नृत्य किया।
कभी-कभी हकीकत किसी फिल्मी कहानी से भी ज्यादा हैरान करने वाली होती है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के दोझा गांव में इन दिनों एक ऐसा ही ‘चमत्कार’ चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसे सुनकर हर किसी की आंखें नम हैं और चेहरे पर हैरानी। जिस मां को परिवार ने 11 साल पहले मरा हुआ मान लिया था, जिसकी याद में आंसू बहाकर श्राद्ध तक कर दिया गया था, वह अचानक अपने घर के आंगन में जिंदा खड़ी मिली। यकीन करना मुश्किल है, लेकिन 80 साल की लीलावती की घर वापसी ने पूरे गांव को भावुक कर दिया है।
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जब मातम के बीच अचानक गुम हो गई ममता
यह कहानी शुरू होती है साल 2015 के फरवरी महीने से। Baghpat के दोझा गांव में रहने वाली लीलावती के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। 9 फरवरी को उनके पति का साया सिर से उठ गया और घर में मातम पसर गया। अभी परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि तीन महीने बाद मई में एक और अनहोनी हो गई। लीलावती अचानक घर से लापता हो गईं। बेटों और बहुओं ने उन्हें हर जगह ढूंढा—गली-मोहल्ला, रिश्तेदारी, अस्पताल और आस-पास के जिले, लेकिन लीलावती का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। जैसे-जैसे दिन हफ्तों और महीनों में बदले, परिवार की उम्मीदें धीरे-धीरे दम तोड़ने लगीं।

मृत मानकर कर दिया गया था अंतिम श्राद्ध
महीनों की तलाश जब नाकाम रही, तो भारी मन से परिवार ने मान लिया कि मां अब इस दुनिया में नहीं रहीं। किसी अनहोनी की आशंका और सामाजिक परंपराओं के चलते परिवार ने लीलावती का श्राद्ध भी कर दिया। Baghpat के इस छोटे से गांव में वह अब केवल यादों और तस्वीरों में सिमट कर रह गई थीं। घर की दीवारों पर टंगी उनकी तस्वीर पर हार चढ़ चुके थे और हर साल उनकी पुण्यतिथि मनाई जाने लगी थी। 11 लंबे साल बीत गए और किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस दरवाजे से उनकी विदाई की दुआएं पढ़ी गई थीं, उसी दरवाजे पर कभी खुशियों के ढोल बजेंगे।
हजारों किलोमीटर दूर राजौरी में सेना को मिला सुराग
उधर, हजारों किलोमीटर दूर जम्मू-कश्मीर के राजौरी में एक अलग ही कहानी चल रही थी। भारतीय सेना के जवानों को वहां एक लावारिस बुजुर्ग महिला मिलीं। वह बेहद कमजोर, थकी हुई और अपनी पहचान बताने में असमर्थ थीं। सेना के जवानों ने उन्हें केवल एक लावारिस बुजुर्ग नहीं समझा, बल्कि उनकी पूरी देखभाल की। उन्हें खाना दिया, इलाज कराया और सबसे जरूरी उनकी पहचान जानने की कोशिश में जुट गए। काफी कोशिशों और धैर्य के साथ की गई बातचीत के बाद आखिरकार उनकी पहचान सामने आई—वह कोई और नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के Baghpat की रहने वाली लीलावती थीं।

एक फोन कॉल और बदल गई पूरी दुनिया
फिर वो पल आया, जिसने सब कुछ बदल दिया। सेना के जवानों ने Baghpat में लीलावती के परिवार से संपर्क किया। जब घर के फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ से मां की सलामती की खबर मिली, तो परिवार को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। उन्हें लगा कि शायद कोई गलतफहमी हुई है। जिनकी मौत को सच मानकर सारे संस्कार पूरे कर दिए गए थे, उनकी सलामती की खबर किसी सपने जैसी थी। लेकिन जब सच्चाई सामने आई, तो पूरे घर में खुशियों का ऐसा सैलाब आया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
राजौरी में हुआ वो भावुक मिलन
खबर मिलते ही परिवार के लोग तुरंत राजौरी के लिए रवाना हुए। उनके दिल में हजारों सवाल थे, आंखों में उम्मीद थी और थोड़ा डर भी—कि क्या वाकई मां उन्हें पहचान पाएंगी? और फिर वो पल आ गया। जैसे ही उन्होंने लीलावती को देखा, सबकी आंखों से आंसू बहने लगे। 11 साल बाद मां उनके सामने थीं। वक्त जैसे कुछ पलों के लिए थम गया था। जब लीलावती ने भी अपने बेटों को पहचाना, तो सारा दर्द और बरसों का इंतजार एक झटके में खत्म हो गया। Baghpat का वो परिवार जो अब तक शोक में था, अब अपनी मां को वापस लेकर घर लौटने की तैयारी कर रहा था।

गांव में डीजे और जश्न के साथ स्वागत
जब लीलावती अपने गांव दोझा लौटीं, तो वहां का नजारा देखने लायक था। पूरे Baghpat में खबर फैल गई कि ‘मरी हुई’ मां वापस आ गई हैं। गांव के लोग अपने काम छोड़कर इकट्ठा हो गए। घर के बाहर तेज आवाज में डीजे बजने लगा और फूलों की बारिश हुई। बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां सब खुशी से झूम उठे। 80 साल की लीलावती खुद भी इस जश्न में शामिल हुईं। उनके चेहरे पर एक सकून भरी मुस्कान थी और वह भी अपनों के बीच झूम रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कुदरत ने उन्हें और उनके परिवार को जिंदगी का एक दूसरा मौका दिया हो।

परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं
लीलावती के पोते बिल्लू बताते हैं कि दादी 11 साल पहले लापता हो गई थीं और हमने हर जगह खोजबीन के बाद उन्हें मृत मान लिया था। जब सेना का फोन आया, तो हमें लगा कि कोई मजाक कर रहा है। वहीं उनके बेटे सतीश कहते हैं कि मां का दोबारा मिलना किसी ईश्वरीय कृपा से कम नहीं है। Baghpat के इस घर में अब फिर से रौनक लौट आई है। इस पूरी कहानी में भारतीय सेना के जवानों की भूमिका सबसे खास रही, जिन्होंने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए एक बिछड़ी हुई मां को उसके घर तक पहुँचाया।
लीलावती की यह घर वापसी हमें सिखाती है कि जिंदगी के किसी भी मोड़ पर उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। कभी-कभी जहां हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है, वहीं से एक नई शुरुआत हमारा इंतजार कर रही होती है। Baghpat की इस घटना ने साबित कर दिया है कि कुछ कहानियां वक्त के साथ खत्म नहीं होतीं, बल्कि वे और भी ज्यादा मजबूती के साथ दोबारा जी उठती हैं। आज दोझा गांव में केवल लीलावती ही नहीं लौटी हैं, बल्कि पूरे परिवार का वो विश्वास लौटा है जो शायद कहीं गहरे में अब भी जिंदा था।
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